दूसरा मत

रविवार, अप्रैल 05, 2009

अपराध और राजनीति

लोकतंत्र की जो सबसे बड़ी ताकत है, लगता है वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। ताकत तो है सबकी भागीदारी लेकिन अपराधियों के मैदान में आ जाने से इसका प्रभामंडल हल्का हो गया है। अपराधियों ने अपने अपराधों की कालिख से बचने के लिए राजनीति की चमक का सहारा ले लिया है। पहले राजनीति के धुरंधरों ने राजनीति में उनका इस्तेमाल किया और बाद में उन्हें लगा कि इनकी मदद की बजाय क्यों न ख़ुद ही कमान संभाली जाए। अब आलम यह है कि ये एकाकार हो चुके हैं। इन्हें अलग करना कठिन हो गया है। अपराधी भी एक से एक। किसी पर बलात्कार तो किसी पर हत्या, किसी पर लूटमार तो किसी पर आगजनी, किसी पर भ्रष्टाचार तो किसी पर स्मगलिंग जैसे आरोप हैं। आंकड़े बताते हैं कि चुने गए उम्मीदवारों में १७ से २० प्रतिशत उम्मीदवार अपराधी होते हैं।

अब इन अपराधियों का क्या किया जाए। कानून में बदलाव किया जाए या और नए कानून बनाये जायें? निचली अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायलय तक सबके लिए यह समस्या बन गई है कि किस प्रकार इन्हें रोका जाए? लेकिन जिन्हें सबसे ज्यादा परेशां होना चाहिए वे उतने गंभीर नहीं हैं। वे हैं राजनीतिक दल। लोकतंत्र को मजबूत बनने की हिमायती पार्टियों पर इसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है कि वे ऐसे लोगों को टिकट न दें जिनकी छवि या कार्य आपराधिक हैं। एक तरफ़ तो साफ़ सुथरी राजनीति की वकालत करती हैं और दूसरी तरफ़ जब टिकट देने का समय आता है तो कई नामी गिरामी अपराधियों को अपना उम्मीदवार बना देती हैं। जहाँ तक जनता का सवाल है तो वह कुछ विकल्पहीनता के मारे तो कुछ अपने स्वार्थ की खातिर तो कुछ भय के चलते अपराधियों को विधान सभाओं से लेकर संसद तक पहुँचा देती है।

दरअसल चुनावी सुधारों का ढोल तो सभी पीटते हैं किंतु बेसुरे होकर। यही कारण है कि रात दिन चलने के बावजूद चंद कदम ही पहुँच पाते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ एक दूसरे पर दोषारोपण कर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा हुआ मान लेती हैं। जनता का तो हाल यह है कि कोऊ नृप होहिं हमें का हानि। लेकिन यही हाल रहा तो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनीति भय का पर्याय बन जायेगी। लोकतंत्र को बचाना है तो पार्टियों को, जनता को और कानून को इस मुताबिक बनाना और बनना पड़ेगा कि अपराधियों को इस सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं मिल सके।

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14 टिप्पणियाँ:

  • आपका ये ब्लॉग निश्चय ही वर्तमान व्यवस्था पर एक सवालिया निशान लगता है
    राजनीती का अपराधीकरण हमारे इस प्रणाली के लिए एक ऐसा धब्बा है जो किसी भी उपकरण से साफ़ नहीं हो रहा

    लेखक Blogger मृत्युंजय, यहां 6 अप्रैल 2009 को 3:14 am बजे  

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    लेखक Blogger मृत्युंजय, यहां 6 अप्रैल 2009 को 3:20 am बजे  

  • चुनाव में अपराधियों की भागेदारी अब एक आम बात हो गई है, एक आस जो बची हुई है वह केवल यह है की हम वोट डालने से पहले यह पूरी तरह से निर्धारित कर ले कि हम किसको वोट देने जा रहे है. अब हमें ही यह प्रथा बदलनी होगी, हम अब अपना वोट केवल उनको ही देंगे जिनकी छवि पूरी तरह से साफ होगी....

    लेखक Blogger rahul bajpai, यहां 6 अप्रैल 2009 को 3:27 am बजे  

  • ब्लॉग के माध्यम से आपके विचार निश्चित ही मेरे जैसे लोगों को प्रभावित कर सकता है, परन्तु भारतीय लोकतंत्र को बदलने के लिए निचे स्तर से ही बदलाव संभव है, जो होता नहीं दिख रहा है. जहाँ तक बात है राजनितिक अपराधीकरण की तो इसको रोकने के लिए कड़े नियम बनाने होंगे,जो एक मजबूत और स्थिर सरकार ही दे सकती है. अभी भी बिहार,उ.प. झारखण्ड जैसे राज्यों से अपराधिक तत्व के नेता जित दर्ज कर रहे हैं , इसके वास्तविक कारण को जानना जरूरी है. आशा है आप इस बारे में भी लिखेंगे.

    लेखक Blogger vikash, यहां 6 अप्रैल 2009 को 3:40 am बजे  

  • मेरा मानना है कि जो लोग अपराधी है उन्हें किसी भी पार्टी से टिकेट नही देना चाहिए तभी अपराध को रोका जा सकता हैं





















































































    ध को रोका जा सकता है

    लेखक Blogger hamsafar, यहां 6 अप्रैल 2009 को 3:53 am बजे  

  • बदलाव तो निश्चित लाना है परन्तु शुरुआत कहा से की जाये ये थोडा मुश्किल है क्योंकि जो कानून बनाने वाले है वही मुख्य धारा में बड़े बड़े आधिकारी नेता तथा उपर से नीचे वाले कर्मचारी सारे किसी न किसी आकाओं
    के सरपरस्ती की छत्र छाया के नीचे दबे पडे है जो कि अपनी छोटे छोटे कार्यो के लिये उन पर निर्भर रहते है उस समय के लिए तो सारे संवाद सही लगते है पर जब वही छाया छत्र वाले कुछ गलत करते तो हम उस समय चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते क्यों कि हम भी उसी कालिख के बढावा देने में प्रमुख कारक है हमारे संसद में १५ से २० प्रतिशत नेता अगर अपराधी छवि के है तो उसका जिम्मेवार कोई और नहीं हम ही है इसमे हमारी जिम्मेदारी भी है हमें ही निश्चित करना है हमे ही बदलना है क्योंकि परिवर्तन ही जीवन का प्रथम नियम है हमे तय करना है कि हमे क्या चाहिए .

    लेखक Blogger manch, यहां 6 अप्रैल 2009 को 4:00 am बजे  

  • इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    लेखक Blogger manch, यहां 6 अप्रैल 2009 को 4:02 am बजे  

  • हम आज लोकतंत्र कि बात कहते है ! लोकतंत्र में सारा अधिकार जनता का होता है जब हम आपराधी को वोट देते है तो सत्ता में वही आएगा कोई शरीफ कहा से आएगा यदि हमे अपराद आतंकवाद से बचना है तो हमे आपने वोट का सही उपयोग करना होगा यदि हम आपराधियों का सपोर्ट न करे तो वो सत्ता में नहीं आ सकते यह गलती सिर्फ हमारी है कि हम उनका साथ देते है और बाद सर्कार का दोष देते है कि सरकार गलत है इसके राज में ऐसा होता है इसके लिए हम खुद जिम्मेदार है कोई और नहीं.!

    लेखक Blogger science, यहां 6 अप्रैल 2009 को 4:13 am बजे  

  • मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ, राजनीति और अपराधियों का एकीकरण वास्तव में बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है, दुःख की बात तो यह है की जिन नेताओं को देश व समाज की जिम्मेदारी सौंपी जाती है वही जनता के विश्वास को बेच डालते हैं, लेकिन अब यह जिम्मेदारी खुद जनता को उठानी है, अब जनता को देखकर, सुनकर, और पिछली गलतियों से सीखकर ही वोट करना होगा, अभी भी बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में आपराधिक छवि के लोग चुनावी मैदान में उतरे हुए हैं, अतः जनता को अब समझ जाना चाहिए कि उसकी अग्निपरीक्षा शुरू हो चुकी है,

    लेखक Blogger kuch lamhe phursat ke, यहां 6 अप्रैल 2009 को 4:21 am बजे  

  • आपका ब्लॉग लोगों को सोचने के लिया विवश करेगा !वे न सिर्फ अपराधिक पृष्ट वाले नेता को नजरंदाज करेंगे बल्कि ऐसे माहौल को भी धीरे धीरे समाप्त करेगे जिसमे ऐसे लोगों की कदर पार्टियों द्वारा हो रही है!

    लेखक Blogger boudhik jagat, यहां 6 अप्रैल 2009 को 4:37 am बजे  

  • अपराधीकरण और चुनाव सुधार का शोर आज कल मीडिया के हर माध्यम द्वारा सुना जा रहा जा रहा है ब्लॉग भी चूँकि इसका एक अंग है तो यह पहल भी उसी कड़ी को आगे बढाने का प्रयास कर रहे हैं बहरहाल यह समस्या सचमुच गंभीर है इसके लिए अगर उमीद्वार को नकारने का विकल्प हो तो निश्चित ही नेताओं की आँखें खुल सकती है आशा करता हूँ की इस पर हमारे निति नियंता आम राय बनाने का प्रयास करेंगे
    धन्यवाद

    लेखक Blogger anil kumar, यहां 6 अप्रैल 2009 को 4:38 am बजे  

  • आज अपराध और राजनीति एक दुसरे के पूरक बन गए हैं जिन अपराधियों को जेल में होना चाहिए वो लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं यह लोकतंत्र के लिए काला धब्बा है. जनता चुप हैं मीडिया अपराध की आड़ में टीआरपी बटोर रहा है सवाल है कि इस स्थिति के लीऐ जिम्मेदार कौन है .बहरहाल समय आगया है कि जनता साफ छवि के उम्मीदवारों को चुने क्योंकि चुनने का हक़ जनता को है

    लेखक Blogger boudhik jagat, यहां 6 अप्रैल 2009 को 6:02 am बजे  

  • आज अपराध और राजनीति एक दुसरे के पूरक बन गए हैं जिन अपराधियों को जेल में होना चाहिए वो लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं यह लोकतंत्र के लिए काला धब्बा है. जनता चुप हैं मीडिया अपराध की आड़ में टीआरपी बटोर रहा है सवाल है कि इस स्थिति के लीऐ जिम्मेदार कौन है .बहरहाल समय आगया है कि जनता साफ छवि के उम्मीदवारों को चुने क्योंकि चुनने का हक़ जनता को है .चक्रपाणि

    लेखक Blogger boudhik jagat, यहां 6 अप्रैल 2009 को 6:07 am बजे  

  • आप के इस ब्लॉग ने हम जेसे युवा मतदाताओ को वोट डालने से पाहिले एक बार आपकी बात सोचना पडेगी कि हमें अपराधी चाहिय या कोई अच्चा राजनेता ये सोचना हमें है

    लेखक Blogger rachit kathil, यहां 7 अप्रैल 2009 को 7:41 am बजे  

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