दूसरा मत

Friday, January 28, 2011

वस्त्र हूं मैं

वस्त्र हूं मैं

मृदा, जल,

अग्नि, रंग का निष्कर्ष हूं मैं

मनीषियों का विमर्श हूं

लेकर स्पर्श मनुज का

धर्म का उत्कर्ष हूं मैं

प्रकृति के कोप का

ऋतुओं का सर्वस्व हूं मैं

लिपट प्रतिमाओं से

ईश्वर का अंश हूं

तंतु नहीं हूं मात्र मैं

श्वास का, विश्वास का

साधना आराधना का

धर्म का, अधर्म का

राजा का, प्रजा का

मान व अभिमान का

ज्ञान व विज्ञान का

सभ्यता का, संस्कृति का

नर का, नारायण का

दर्श हूं मैं

वस्त्र हूं मैं

परत्र हूं, सर्वत्र हूं

वस्त्र हूं मैं, वस्त्र हूं मैं


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