दूसरा मत

सोमवार, मार्च 08, 2010

फिदा हुसैन का विदा होना

हुसैन साहब विदा हो गए हैं। कतर के नागरिक हो गए हैं। इसलिए कि भारत में, उनके अपने देश में उन्हें पराया कह दिया गया। बड़े ही अफसोस की बात है। हुसैन साहब चित्रकार हैं, बड़े चित्रकार हैं- देश के ही नहीं, दुनिया के बड़े चित्रकार। उनका जितना मान अपने देश में होना चाहिए था, नहीं हुआ। वजह बड़ी बेढंगी है। उन्होंने एक देवी का ऐसा चित्र बना दिया था कि लोग नाराज़ हो गए। मरने-मारने की धमकी दे डाली। लोगों को यह समझने में शायद भूल हो गई कि कलाकार हैं वे। उन्हें इतनी छूट तो मिलनी चाहिए कि किसी का भी, कैसा भी चित्र बना सकें। कलाकार का तो यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह क्या प्रकृति, क्या मानव, क्या दानव, क्या देवता और क्या देवी को किसी भी रूप में, भंगिमा में कल्पना में उतार सके और रंगों के सहारे कैनवास पर बिछा सके। बड़े अहमक हैं वे लोग जो उनके इस अधिकार को सीमित करने का दुस्साहस करते हैं, कर रहे हैं। अब कैसी रही। वे तो देश ही छोड़ गए। वहां उन्हें किसी भी प्रकार का बंधन नहीं है। वे अपनी कला की दुनिया में बेखौफ खुद भी बिना वस्त्र घूम सकते हैं। जूता न पहनने का संकल्प तो वे पहले ही ले चुके हैं।

कला के पारखी व मर्मज्ञ विलाप कर रहे हैं कि वे क्यों चले गए उन्हें बिलखता छोड़ कर। अब भला किस की चित्रकारी पर इतराएंगे वे लोग। किसकी अदा पर फिदा होंगे। अखबारों में कला व कलाकार की आजादी पर कैसे शब्द चीत्कार करेंगे। कैसे लोगों की नासमझी पर अपनी समझ का सिक्का जमाएंगे। यही दुख तो सबसे बड़ा है। वैसे देश में और भी कलाकार हैं जो कैनवास पर रंग फेंकते हैं और कुछ न कुछ तो बन ही जाता है। उनकी प्रतिभा पर मदहोश होने का इल्म उन्हें नहीं आता क्योंकि कलाकार तो एक ही थे और वे कतर चले गए। इन पारखियों के पंख कतर कर चले गए। रही-सही कसर उन्होंने अपना भारतीय पासपोर्ट जमा कर पूरी कर दी। अब तो मुहर लग गई।

इधर सरकार की बेबसी भी खूब है। अपने देश की संसद की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती तो भला इन कलाकार महोदय की सुरक्षा की गारंटी कैसे देती। उसे तो बस रोजगार गारंटी मालूम है और उसने इस बात की गारंटी दे दी कि कतर में हुसैन साहब को रोजगार मिलने की पूरी गारंटी और वह भी साल के ३६५ दिन। नरेगा में तो १०० दिन की ही बात है भई। बहरहाल कला के लिए जिस माहौल की दरकार होती है वह हुसैन साहब को कतर में जरूर मिलेगा। कला झूमेगी, गाएगी, नाचेगी (कपड़ों की गारंटी कौन लेगा), बेमिसाल बनेगी। यह भारत का दुर्भाग्य है कि हुसैन साहब कला की दुनिया को बिलखता छोड़ गए। अब भला कौन गजगामिनी को निहारेगा। हां इतना जरूर किया जा सकता है कि उनकी विदाई के सम्मान या विरोध में एक दिन के सरकारी अवकाश की घोषणा की जा सकती है। सरकार भी इस अपराध बोध से मुक्त हो पाएगी कि उसने इस सदी के महाभिनिष्क्रमण पर कुछ नहीं किया।

अलबत्ता इतना अफसोस जरूर होगा कि कला के धर्म, संप्रदाय, जाति व अन्य किसी भेदभाव से ऊपर होने का अहसास नहीं हो पाएगा। एक वही तो थे जो कला को उसके पवित्र रूप में देखते थे और महिलाओं (हर महिला देवी होती है) को उसके जैविक वस्त्रों में ही देखा जाना उचित मानते थे। जो लोग कहते हैं कि उन्होंने हिन्दू धर्म का अपमान किया है, वे दरअसल कलाकार की निगाह को नहीं समझते हैं। धन्य है इस देश की धरती जहां ऐसे कलाकार पैदा हुए। शरदचंद्र तो बस यूं ही महिलाओं की प्रशंसा में कुछ लिख दिया करते थे। कहां उनका लिखना और कहां इनका लीपना। कोई मेल ही नहीं है। उस नालायक कार्टूनिस्ट के लिए भी क्या कहा जाए। वो तो पूरा चकरम निकला। उसे कार्टून ही बनाना था तो किसी देवी का बनाता, किसी महिला का बनाता और सदी के महान कलाकार होने का तमगा पा जाता।

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1 टिप्पणियाँ:

  • कुछ हिन्दुस्तानी सेक्यूलरों का रोना देख कर हँसी आती है ....पर सब जानते हैं कि ये मगरमच्छ के आँसू हैं । अब मकबूल फिदा हुसैन तो विदेशी हो गए...उनके पाँव धो कर पीने है तो कतर चले जाईए... अब अगर हुसैन अपनी माँ की नंगी तस्वीर भी अपने दरवाज़े पर लगा ले तो भी हमारे दरवाजे उस घटिया कीडे के लिए नहीं खुल सकते ।

    लेखक Blogger DIVINEPREACHINGS, यहां 8 मार्च 2010 को 11:41 pm बजे  

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