क्या कहा, शेर को शाकाहारी होना चाहिए
राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन का गौरव मिलने से हम फूले नहीं समाए। सात साल पहले हमने जुगाड़ लगाया और पा लिया अधिकार खेल कराने का। कोई कह रहा था कि इन्हें पाने के लिए भी हमने कुछ देशों को पैसा-वैसा दिया कि वे अपनी दावेदारी छोड़ दें और हमें खेल करने, माफ कीजिए, कराने का जिम्मा दिया जाए। खैर, कितना अच्छा हुआ कि हमें मेजबानी मिली। अब पूरे विश्व को दिखाने का मौका मिल ही गया है तो पूरे जी-जीन से यही कोशिश करनी है कि कोई चूक न रह जाए। शुरुआत की हमने खेल गांव बनाने से। कितने अहमक होते थे वे लोग जो कहते थे कि मूर्खों के गांव नहीं बसते। गांव का क्या है पैसा लाओ, अभी बसा देते हैं। यमुना के किनारे गांव अच्छा बसेगा, यह बात सबकी समझ में आ गई। फिर क्या था, सुप्रीम कोर्ट को भी बात जम गई। कहा, बसाओ गांव। देखते हैं कौन रोकता है। गांव बसने लगा। अब बांस बल्लियों का जमाना तो है नहीं। बुल्डोजर, कंक्रीट, टाइल्स, लैंडस्केप, एलिवेटर, जकूजी जैसे शब्द तैरने लगे हवा में।
दिक्कत एक बात की थी कि समय कम था। फिर भी हम भारतवासी ठहरे। हमने नदियों का रुख मोड़ दिया है, यह तो एक गांव का मामला है। जिम्मा संभाला था कलमाड़ी एंड कंपनी ने। वे अपने भागीरथ प्रयत्न के लिए ही जाने जाते हैं। सब बड़ी उम्मीदों से उनकी तरफ देख रहे थे। उन्होंने भी अपना कुनबा जुटाया और जुट गए। लंदन से शुरुआत की और खेल गांव तक पहुंच गए। खेलने के लिए स्टेडियम भी दुरुस्त करने थे। कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। खेलों के लिए खेलने लगे वह और इस धुन में नियमों का ध्यान नहीं रहा। अब आपातकाल में मर्यादा की बात तो होती नहीं है। होते-होते किसी नामुराद पत्रकार की निगाह पड़ गई उन पर। बस, उसने खोद डाली नई नवेली सड़क जिस पर चल कर खिलाड़ी आने थे। कई कमियां गिना दीं। बड़ा हो हल्ला मचा। क्या अखबार क्या चैनल बजने लगा राग कलमाड़ी। सुर में तो कुछ भी नहीं था लेकिन सब सुन रहे थे।
प्रणब दादा कूदे। अंत में प्रधानमंत्री भी कूद पड़े कि क्या हो रहा है। सीवीसी ने उछल-कूद मचाई। जनता को खराब लगा। कहने लगी, यह कैसे खेल हैं। इसमें तो भ्रष्टाचार हो रहा है। सामान घटिया लगा रहा है, पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। सत्तर हजार करोड़ में तो नया शहर बस जाता। एक मंत्री जी तो राशन-पानी लेकर खिलाफत पर उतर आए। मांग उठी कि ऐसा नहीं चलेगा। शेरा अपना शुभंकर है तो क्या हुआ, शेर को शाकाहारी होना चाहिए। क्या कहा, शेर को शाकाहारी होना चाहिए। लोगों ने कहा, अखबारों ने कहा, चैनलों ने कहा और तो और नाखून व दांत गंवा चुके शेरों ने भी कह डाला।
तख्तियों पर लिख कर लोग निकल पड़े। हर गली से, हर मुहल्ले से, हर शहर से ऐसा शोर उढने लगा कि शेर को शाकाहारी होना चाहिए। गरम मिजाज के लोगों ने कहा, शेर को शाकाहारी होना पड़ेगा। देखते हैं कैसे नहीं होता। किसी ने कहा, खेल टाल दो। सुप्रीम कोर्ट ने नो एंट्री की तख्ती दिखा दी। शेर को क्या पड़ी थी कि कुछ सुनता। उसने भी सोचा चिल्ला रहे हैं, चिल्ला लेने दो। सर्कस का मालिक ही कुछ करेगा। मालिक ने सोचा, ऐसे तो तमाशा बिगड़ जाएगा। उसने नया रिंग मास्टर रख लिया। उसे मालूम तो था कि यह पुराना शेर है जो अब रिंग मास्टर बन गया है और कभी इसके आगे भी लोग शाकाहारी वाली मांग रख चुके हैं। उसने बुलाया उसे और कहा कि देख, लोग आएंगे, चिल्लाएंगे, शराफत का हवाला देंगे, कसमें देंगे कि तुम रिंग मास्टर हो, शेर को इस तरह से ट्रेनिंग दो कि वह गोश्त खाना छोड़ दे। तुम जानते हो तुम्हें क्या करना है। उसने हामी भरी और कहा कि मेरी ट्रेनिंग का कमाल देखेंगे तो दंग रह जाएंगे। मेरा नाम सीवीसी ऐसे ही नहीं है।
सीवीसी ने कहा, शेरों अभी जितना खाना है, खा लो। खेल हो जाने दो। फिर हम एक खेल खेलेंगे। लोगों को बताएंगे कि हमने एक शपथ पत्र बनाया है जिस पर सभी शेर हस्ताक्षर करेंगे कि वे अब गोश्त नहीं खाएंगे। लिहाजा, अभी जितना खा सकते हो, खा लो। थोड़े समय जुगाली करनी है। जब खेल खत्म होंगे तो लोग वैसे भी मांग छोड़ देंगे क्योंकि उन्हें भी तो अपने भीतर बैठे शेरों को जगाना है। हम भी जानते हैं और वह भी कि शेर शाकाहारी हो ही नहीं सकता। यकीन नहीं आता तो मंत्री, पुलिस, वकील, पत्रकार किसी से भी पूछ कर देख लो।
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लेबल: कलमाड़ी, राष्ट्रमंडल खेल


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