प्रेम न बाड़ी ऊपजै...
कबीर दास जी ने प्रेम पर कुछ ऐसा लिख दिया कि आज उसका सही अर्थ समझ में नहीं आ रहा है। कहा था- प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय, राजा परजा जेहि रुचे सीस देई ले जाय। वे भी आज होते तो सोचते मैंने क्या कह दिया था। सारा कहा, किया माटी हो गया। प्रेम तो उपज रहा है। शायद आप सवाल करें कि कहां? लगता है आप किसी पार्क में नहीं जाते। न सेहत का खयाल है और न ही प्रेम की बढ़ती बेल का। देखिए तो सही। बुद्ध जयंती पार्क पहुंचिए, लोदी गार्डन में भी जमीन उपजाऊ है। किसी मॉल में ही चले जाइए। किसी मल्टीप्लेक्स में घूम आइए। प्रेम के हर घड़ी, हर गली उपजने का साक्षात्कार हो जाएगा। रही बात हाट में बिकने की तो आपसे बेहतर कौन जानता है कि पूंजीवाद के जमाने में क्या-क्या नहीं बिकता है। अब तो नव उदार पूंजीवाद का जमाना है। बाजार का बोलबाला है। हर गली में हाट है, हर सड़क पर ठाट है और किसी से बात करके देखो तो पता चलेगा कि हर किसी के ठाट-बाट हैं। हाल ही में योजना आयोग के अहलूवालिया साहब ने भी कहा था। खैर, बात कबीर की हो रही थी। उनका कहना था कि कहीं कोई भेद नहीं है। बस सीस ही तो देना है। इधर आपने सिर कटाया, उधर प्रेम की बारिश हुई।
हम चाहेंगे कि कबीर जी अपने कहे में कुछ संशोधन कर लें। एक तो यह कि प्रेम अब बाड़ी-हाट में ही उपजता-बिकता है। दूसरे, सीस देने की बात न करें। कभी रही होगी सबकुछ निछावर करने की बात, देने की बात। अलौकिक हो या शारीरिक, एक से दूसरे गात तक की दिव्य यात्रा का नाम प्रेम रहा होगा। अब वह विशुद्ध बाजार है, अधिकार है, गणित है, स्वतंत्रता की नई परिभाषा है। प्रेमियों के बीच पंचायत भी है। खाप है, मौत की थाप है। इसमें हर किसी को बताने की कानूनी फरमाइश है, गुजारा भत्ता की जोर आजमाइश है। आज यह सहचरी संस्कृति, सहजीवन, लिव-इन रिलेशनशिप के झीने वसन में लिपटी अदालत की पैमाइश भी है।
कुछ शर्तें हैं जिन्हें मानने पर ही आपको खास किस्म का दर्जा मिल पाएगा। आप अदालत में अपने प्रेम की कानूनी हाथों से तार-तार होती पवित्रता को मुस्कराते हुए निहार पाएंगे। गुनाह प्रेम करना नहीं, गुनाह अदालत में जाकर भत्ता मांगना या इनकार करना नहीं है। गुनाह है सबको न बताना कि आप फलां से प्रेम करते हैं। अब अदालत में जाएंगे तो ऐसा ही होगा। परिभाषाएं तय की जाएंगी। मानक तय किए जाएंगे। कसौटियां तय की जाएंगी। उन पर आप खरे उतरे तो प्रेमी नहीं तो अपराधी।
लेकिन क्या वाकई यह किसी के सही गलत होने का सवाल है। प्रेम के आधुनिक आयाम चौंका रहे हैं। शब्दों में लिपटा अपमान पवित्र दायरे में कालिख पोत रहा है। अदालत उसे तो रखैल कह रही है, लेकिन दूसरे को कोई नाम नहीं दे रही है। एक महिला वकील आपत्ति जता रही हैं। संभव है कोई और भी जताए। जरा व्याख्या पर गौर करें- सप्ताहांत या एक रात साथ रहने से कोई दूसरी औरत नहीं बन जाती। संबंधों के आधुनिक शामियाने में कौन किसे किस निगाह से देख रहा है, पता नहीं। दोष की अंगुली किसी की तरफ नहीं है और न ही होनी चाहिए। इतना जरूर इशारा है कि संबंधों की व्याख्या तो आधुनिक पैमानों से हो रही है लेकिन नजरिया अभी भी पुराना है। दोनों में जब तक सामंजस्य नहीं होगा, वादों-फरियादों का सिलसिला चलता रहेगा।
इसमें सबसे अधिक नुकसान प्रेम का ही हुआ है क्योंकि अभी तक प्रेम बंधन है, कलंक है, जागीर है, प्राचीर है। इसे खुले आकाश की तलाश है जहां पंखों को फैला निराकार, निःशब्द, असीम को ओर उड़ा जा सके। कबीर दास को शतशत प्रणाम।
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