ये जो देश है मेरा
बेचैन बक्सरी सुबह-सुबह ही आ धमके थे। बेहद गुस्से में थे। हम अखबार के पन्ने पलट रहे थे। आते ही सवाल दागा, ‘इ गिलनिया और अरुंधतिया कौन है जी? तुम जानते हो इनको?’
हमने हंसते हुए कहा, ‘हां, देखा तो है। बूढ़े आदमी हैं। कब्र में पांव लटके हैं। थोड़ा भटके हुए हैं, इसलिए कब्र का पता पूछ रहे हैं। दाढ़ी मूंछ सफेद हैं। अरुंधती एक महिला हैं। जवान हैं। बाल भी काले हैं।’
बस फिर क्या था। उखड़ गए हत्थे से। बोले, ‘तुम्हें मजाक सूझ रहा है। सही-सही बताओ क्या हैं ये लोग।’
हमने कहा, ‘पहले त्यौरियां तो उतारिए।’ इसके बाद हमने बच्चों की मां से चिरौरी की कि देखो तो बक्सरी जी आए हैं। जरा गर्म चाय मिल जाए तो इनका मन कुछ ठंडा हो। उन्होंने बड़े ठंडे भाव से चाय का पानी गर्म होने के लिए रख दिया।
उनका मन कुछ शांत-सा दिखने लगा तो मैंने बात में लकड़ी डाल आग उकेरी। पूछा, ‘आपको का लेना है गिलनिया और अरुंधतिया से।’
अंगोछा सिर पर बांध शास्त्रार्थ की मुद्रा में आते हुए बोले, ‘लेना क्यों नहीं है। और हमको ही क्यों, हिन्दुस्तान के हर नागरिक को लेना है। कैसी बातें करता है वह। दिल्ली में आकर कश्मीर को अलग करने की बात करता है। कहता है कि लद्दाख वाले भी चाहते हैं कि आजादी मिले। और, वो जो औरतिया है, उसकी हिम्मत तो देखो। कहती है कि कश्मीर हमारा न था, न है। तुम्हें उनका ऐसा बोलना कुछ भी नहीं लगता।’
‘ठीक ही तो है। कश्मीर में रहता है। खुद को अलगाववादी कहता है। वैसे है वह हुर्रीयत का अध्यक्ष लेकिन बात अलगाव की करता है। इसी पर उसकी दुकान चलती है। नौजवानों को बरगलाता है। पत्थर फिंकवाता है। कहता है, जाओ फौजियों को इतना तंग कर दो कि वे गोली चला दें। फिर जैसे ही कोई मरता है, कहता है, देखो ये लोग अत्याचार कर रहे हैं। उसका तो काम ही कुछ ऐसा है। उसके लिए क्यों माथा खपा रहे हैं।’
‘और यह महिला क्या चाहती है?’
‘वह क्या चाहेगी। वह तो बायीं तरफ झुकी हुई है। दावा है कि वह लेखिका है। बहुत बड़ा पुरस्कार भी मिला है। उसे तो ऐसे कामों में मजा आता है। आप नहीं जानते कि सरकार को अंग्रेजी में और भोंपुओं के पीछे खड़े होकर जुतियाने में कितना मजा आता है। उसको मालूम है। पहले भी तो उसने कहा था कि नक्सलियों ने बंदूक उठाकर सही किया है। अब कश्मीर पर बोल रही है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, यह भी आपको बताना पड़ेगा।’
बक्सरी भौंचक से हमारी तरफ देख रहे थे। उन्हें लगा कि हमारे लिए इन बातों का कोई महत्व नहीं है। बोले, ‘बड़े अहमक हो तुम। इतनी आसानी से कैसे कह रहे हो। गुस्सा नहीं आता तुम्हें।’
हमने उनकी झुर्रियों में झांकते हुए कहा, ‘जानते नहीं क्या, क्रोध से विवेक मर जाता है। हिंसा से शुरु हुई हर बात शांति पर खत्म होती है। इसीलिए तो सरकार ने शांत भाव से बातचीत करने वालों को कश्मीर भेजा है।’
उछलकर बोले, ‘वही जिसमें तुम्हारी बरादरी का भी एक आदमी है। बहुत बोलता है। तुम लोगों को तो बोलने की बीमारी है। मौका मिला नहीं कि शुरू हो गए। वह तो और नालायक है। कहता है कि पाकिस्तान को भी बुला लो बात करने के लिए। बड़ा ज्ञानी है। पिछले साठ सालों में यह बात किसी की समझ में नहीं आई। अब यह कह रहा है तो मान लो।’
हमने भी टाटा का शुद्ध नमक छिड़का। ‘ठीक ही तो है। सरकार को यह बात कहां समझ में आ रही थी। दोनों देशों का बड़ा पैसा खर्च हो रहा है लड़ाई झगड़े में। लिहाजा, उन्हें भी बुला लो। आतंक-आतंक चिल्लाते रहते हैं लेकिन कुछ बदला। रातोंरात सड़क बनवा कर एक प्रधानमंत्री उनके पास गए। उनके राष्ट्रपति हमारे पास आए। क्या हुआ। वही ठाक के तीन पात। हम कहते हैं आतंक, वे कहते हैं कश्मीर। दोनों अपना-अपना राग छेड़े हुए हैं। इस बीच घाटी में पत्थर चलते हैं। सीमा पर बंदूकें चलती हैं। कुछ लोग मरते हैं और दोनों अपनी-अपनी अदा से हुंकार भरते हैं। यही किस्सा तो चल रहा है। और पाकिस्तान को बुलाने के नाम पर आप क्यों उखड़ रहे हैं। पाकिस्तान पर ही क्यों आग बबूला होते हैं। चीन का कुछ कर पाएंगे क्या। 62 को भूल गए। आज वह अक्साई चीन को अपना कहता है। अरुणाचल प्रदेश को अपना कहता है। उसी कश्मीर के लोगों को नत्थी वीजा देता है। जनरल साहब को ठेंगा दिखा देता है। उसका क्या उखाड़ लिया।’
अब बक्सरी जी मेरी तरफ शक की निगाह से देखने लगे कि यह भी उनकी तरह ही बोल रहा है। बड़बड़ाने लगे, सब देशद्रोही हैं। इनको फांसी पर लटका देना चाहिए।
मैंने बात आगे बढ़ाई।
‘अभी कुछ ही समय पहले की तो बात है। कश्मीर के नौजवान मुख्यमंत्री ने बड़े धड़ल्ले से कहा था कि कश्मीर का तो भारत में विलय हुआ ही नहीं है। केंद्र सरकार व कांग्रेस के कई नेताओं ने कितनी आसानी से उसे स्वीकार करते हुए माना था कि उन्होंने गलत कुछ नहीं कहा है। उनके कहने का लोगों ने सही अर्थ नहीं लगाया। कितनों को फांसी पर चढ़ाइएगा। फिलहाल, गिलानी और अरुंधती पर देशद्रोह का मुकदमा चल सकता है, ऐसी खबरें अखबारों में हैं। परेशान मत होइए।’
गरम-ठंडी बातचीत के बीच चाय आ गई थी। हमने कहा कि चाय पीजिए। आप क्यों लाल-पीला हो रहे हैं। सरकार कुछ करेगी। सरकार तो गांधी जी से प्रेरित और प्रभावित है। इसीलिए दिल्ली में आकर, ऐसे बयान देकर, तमाचा मारकर लोग चले गए हैं। अब सरकार ने दूसरा गाल आगे कर दिया है। गिलानी ने मारा, अरुंधती ने मारा, उमर अब्दुल्ला ने मारा, अब पत्रकार पडगांवकर तमाचा मार रहे हैं। सरकार प्रफुल्लित हो रही है कि अब तो समझ लीजिए कि गांधीजी का सच्चा अनुयायी कौन है।
बेचैन बक्सरीजी अपनी बेचैन आत्मा के साथ उठ खड़े हुए और जब तक हम अगली चाय पर आने के लिए कहें, वह सब पर लानत भेजते हुए गली से मुड़ चुके थे।
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