वे, जो फरमाते हैं
बच्चे स्कूल जा चुके थे। अखबार की खबरों में उलझा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। देखा तो बक्सरीजी खड़े थे।
मैंने कुटिल मुस्कान के साथ पूछा, कहां चले गए थे। बहुत दिनों से देश के हालात पर विधवा विलाप नहीं हो पाया।
बेचैन बक्सरी जी कुछ नहीं बोले। चुपचाप प्रसाद (छठ) की पोटली पकड़ाई और धम से तख्त पर बैठ गए। कुछ देर शांत रहने के बाद उनके भीतर का जागरूक नागरिक बोल उठा, जरा यह बताओ कि सुदर्शन ने जो कहा है, वह सही तो नहीं है। क्या वाकई सोनिया ने अपनी सास और पति का राम बोलो करवा दिया।
मैंने कहा, वो ऐसा क्यों करवाने लगी। भला अपने ही घर को कोई उजाड़ता है।
नहीं, तुम समझते नहीं हो। जैसा कि सुदर्शन यह भी कह रहे हैं कि वह अवैध संतान हैं तो उसके भाग से छींका टूटा कि राजीव ब्याह कर ले आए। हो सकता है कि उसके मन में धीरे धीरे यह लालच जागा हो कि एक न एक दिन इस देश पर राज करूंगी। उसके लिए जरूरी था कि औरंगजेब के पद चिह्नों पर चला जाए।
क्या ऊलजुलूल बोले जा रहे हैं। ऐसा कहीं होता है। आपने देखा नहीं कि किस शालीनता और त्याग से उन्होंने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया।
बक्सरीजी तमतमा गए। बोले, अरे भई तुम तो कांग्रेसियों की जुबान बोलने लगे। ये जो लोग हैं, फरमा रहे हैं कि असली बात क्या है तो तुम उनकी तरफ से सफाई क्यों देने लगते हो।
तब तक पत्नीजी बिना कहे नाश्ता ले आई थीं।
मैंने बक्सरीजी को और उकसाया, आप क्या कहना चाहते हैं कि सुदर्शन, गडकरी, मोदी जो कहें वो ठीक और राहुल, सोनिया, दिग्विजय, सिंघवी जो कहें वो गलत। गडकरी कितना कुछ बोलते हैं। कभी कहते हैं कि प्रवासियों के कारण दिल्ली-मुंबई का विकास रुक गया है तो कभी फरमाते हैं कि दिग्विजय मुसलमानों के रिश्तेदार हैं। अब तो कहा जा रहा है कि सुदर्शन के पीछे गडकरी हैं। गडकरी जो कहना चाहते थे, वह उन्होंने सुदर्शन से कहलवा दिया। दूसरी तरफ सोनिया भी फरमाती हैं, राहुल भी बोलते हैं। मोदी को मौत का सौदागर किसने कहा, सोनिया ने। सिमी और आरएसएस को एक जैसा किसने कहा, राहुल ने।
क्या मतलब। तुम किसकी तरफ से बोल रहे हो।
मैं किसी की तरफ से नहीं बोल रहा हूं। बोलने की जरूरत ही नहीं है। बोलने वाले पहले ही इतने सारे हैं कि हमारी कौन सुनेगा। आपके साथ दिक्कत यही है कि आप बातों को दिल से लगा लेते हैं। सुदर्शन ने कहा और आप निकल पड़े देश के दुर्भाग्य पर मर्सिया पढ़ने। हकीकत तो बस इतनी सी है कि ये जितने नेता हैं, समय समय पर ऐसा वैसा फरमाते रहते हैं। वे उस खेल के नियमों से बंधे हैं जिसे राजनीति कहते हैं। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप की गुंजाइश खत्म हो जाए तो खेल का मजा खराब हो जाता है। मुद्दे तो हवा में तैरते ही रहते हैं। बस समय और माहौल के हिसाब से उन्हें पकड़ लेना है, कुछ कहना है और जनता व मीडिया को स्टापू खेलते देखना है। कभी भ्रष्टाचार है तो कभी महंगाई है, कभी आतंकवाद है तो बाढ़-अकाल-भुखमरी। सोचो ये बयान खत्म हो गए तो मीडिया की खुराक कहां से आएगी। जनता को भी तो झुनझुना चाहिए बजाने के लिए। मेरा नेता अच्छा तो तेरा नेता बुरा। कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी की तरफ से लड़ने को मुद्दे की अफीम कहां से मिलेगी। क्योंकि नशा बने रहना जरूरी है। होश में आ गए तो समझ में आ जाएगा कि पर्दे के पीछे का सच क्या है। दालमंडी में रात में जाओ और दिन में जाओ तो क्या एक जैसा दिखता है, नहीं। दिन के उजाले में चीजें साफ दिखती हैं। इसीलिए बयानों, प्रदर्शनों, संसद में हंगामों से धुंध बनी रहती है।
बक्सरीजी नाश्ता कर चुके थे। हाथ में पानी का गिलास था लेकिन पी नहीं रहे थे। मैंने कहा, पानी तो पी लीजिए।
हां, पी तो रहा हूं। लेकिन जो कह रहे हो, क्या वाकई ऐसा ही है।
मेरे कहने से नहीं, आप खुद समझिए। ऐसा नहीं होता तो राहुल यहां-वहां नहीं डोलते फिरते, ए. राजा बेहयाई से कुर्सी से चिपके नहीं रहते, जयललिता अचानक सोनिया के करीब नहीं आ जातीं, मनमोहन सिंह कुछ भी बोलने से पहले सोनिया की तरफ नहीं देखते, नेता अरबों रुपये नहीं डकार जाते, चह्वाण और कलमाड़ी हिम्मत नहीं करते घोटालों की पोटली बगल में दबाने की, हंसराज भारद्वाज कर्नाटक में भाजपा से कबड्डी-कबड्डी नहीं खेलते, कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी नहीं बनते, साधुओं में अपराधी नहीं छिपे होते, नित्यानंद और इच्छाधारी बाबा देह व्यापार के पंडित निकलते, देश से भुखमरी खत्म हो गई होती, अदालतों में न्याय नहीं बिकता। लिहाजा, अफीम और झुनझुना जरूरी है। खाइए औऱ बजाइए।
बक्सरीजी की बेचैनी बढ़ने लगी। बोलो, अच्छा चलता हूं, फिर आऊंगा।
मैंने आग्रह किया, जरूर आइएगा, देश के हालात पर चर्चा जारी रहेगी।
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