दूसरा मत

मंगलवार, दिसंबर 28, 2010

अगले प्रधानमंत्री राहुलजी ही होंगे

सोनियाजी ने जब प्रधानमंत्री की कुर्सी को तपस्वियों की भांति त्याग भाव से अस्वीकार किया था तो बड़ी जय-जयकार हुई थी। कितनों ने अश्रुओं से उनके चरण पखारे थे। मनमोहन सिंह को उस कुर्सी पर बैठना पड़ा था और उन्होंने भरत भाव से इसे स्वीकार किया था। अब क्या है कि इस कुर्सी की महिमा है ही बड़ी निराली। पहले जब विशालकाय वृक्ष गिरा था तो धरती दहली थी और उस कंपन को प्रभावहीन बनाने के लिए राजीवजी ने उस कुर्सी की शोभा बढ़ाई थी क्योंकि शास्त्रों के अनुसार उनका ही अधिकार उस पर था। वे भी असमय चले गए। देश बड़ी दुविधा में पड़ गया कि अब कौन आएगा। कुछ लोगों ने आगे बढ़कर कहा कि हम बैठेंगे। वे बैठे भी, पर बात कुछ बनी नहीं। मौनी बाबा कुछ ज्यादा देर बैठे और कुछ वाचालों ने थोड़े समय के लिए उसका सुख लिया।

वह समय देवताओं (नेताओं) के लिए संकट का था। निर्णय लिया गया कि सब अपनी शक्ति का अंश दें और देवी को देश चलाने की जिम्मेदारी दी जाए। पूरे देश से पूछा गया। अधिसंख्य ने हामी भरी। लेकिन, देवी सोनिया ने कहा, मैं तो सारथी बनूंगी। नया जमाना है न, कृष्ण का काल नहीं है। मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाया गया और रथ संभाला देवी ने। देश चल रहा है। समय बीत रहा है। मनमोहनजी ने इतने दिल से राजकाज चलाया कि दिल का ऑपरेशन करना पड़ा। हालांकि उनके मन में भी हूक उठती रहती है कि वे तो नाहक बैठे हैं। राजकुमार अब जवान हो चुके हैं। शस्त्र और शास्त्र में पारंगत हो चुके हैं। नीति-रीति का ज्ञान हो चुका है। सही मुहूर्त का इंतजार है।

मनमोहनजी कोई नई बात नहीं कह रहे हैं। सबको पता है कि सिंहासन की शोभा किससे बढ़ेगी। आज नहीं 20 साल पहले भी लोगों को यह प्रकाश हो चुका था कि राहुलजी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। राजीवजी के साथ चलने वाली विशेष सुरक्षा दल के कुछ सदस्य मिल जाते थे तो यही कहा करते थे कि अगले प्रधानमंत्री तो राहुलजी ही बनेंगे। उनकी आंखों की चमक बताती थी कि राजभक्ति गहराई तक उनमें उतर चुकी है। दावे के साथ कहते थे कि देश चलाना तो इनके परिवार को ही आता है।

वाकई दावे में दम था। आज कांग्रेसी इस बात पर लड़ने मरने को तैयार हो जाते हैं कि सोनियाजी चार नहीं चालीस बार पार्टी की अध्यक्ष बनेंगी। जिसे एतराज है, उसकी खैर नहीं। फलहाल चर्चा राजकुमार की है। राजनीति की पाठशाला से निकल कर विश्वविद्यालय में आ चुके हैं। वाचस्पति होने का राह पर हैं। उसी सिलसिले में उनकी शोध-प्रबंध तैयार हो रहा है। पूरे देश में घूम-घूम कर वह आंकड़े जुटा रहे हैं। कभी दलितों के घर रहने-खाने जाते हैं तो कभी युवाओं का आह्वान करते हैं कि भारत निर्माण तुमसे ही होगा। बाकी मैं हूं ना। अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के किसानों के आंदोलन में उन्होंने अपनी शाही उपस्थिति दर्ज कराई थी कि किसानों का अहित नहीं होने दिया जाएगा। प्रधानमंत्री से ढेर सारे आश्वासन ले आए। वे भी जानते हैं कि मैं तो दूसरे भाव से यहां बैठा हूं। उत्तराधिकारी तो राहुलजी ही हैं। इससे भी आगे चले तो उड़ीसा मं नियामगिरी पहुंच गए। एलान कर दिया कि आदिवासियों का दुख दर्द उनका दुख दर्द। उन्होंने बड़े विनम्र भाव से कहा कि दिल्ली में मैं आपका सिपाही हूं। घबराने की जरूरत नहीं है।

अलबत्ता बीच-बीच में राहुलजी यह भी कहते रहते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के अलावा भी और काम है। वही एकमात्र काम कैसे हो सकता है। ठीक ही तो है। जो तय है उसे दोहराने से क्या लाभ। अभी तो विराट होने को मंद-मंद मुस्कराते हुए देखना है। उनमें राहुल सांकृत्यायन की घुमक्कड़ी है तो चंद्रगुप्त की वीरता भी है। चाणक्य कौन है, यह समझना आपका काम है।

राहुलजी की पारखी नजर का उल्लेख करना तो रह ही गया। उन्होंने कितनी बारीकी से समझ लिया है कि सिमी और आरएसएस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिमी तो क्या सफाई देगी, आऱएसएस वाले कहते, चिल्लाते, नाराजगी दिखाते, उनकी नासमझी का ढिंढोरा पीटते घूम रहे हैं। घूमते रहो, उनकी बला से। मुसलमान भाइयों को क्या समझ आया, उन्होंने बताया नहीं। हो सकता है चुनाव में बताएं। अब भी किसी को शक हो कि राहुलजी का शोध प्रबंध स्तरीय नहीं होगा तो वे अपना इलाज कराएं। अभी भी कोई नहीं मान रहा कि अगले प्रधानमंत्री राहुलजी ही होंगे तो उनकी नागरिकता की जांच करानी होगी।

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क्या कहा, शेर को शाकाहारी होना चाहिए

राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन का गौरव मिलने से हम फूले नहीं समाए। सात साल पहले हमने जुगाड़ लगाया और पा लिया अधिकार खेल कराने का। कोई कह रहा था कि इन्हें पाने के लिए भी हमने कुछ देशों को पैसा-वैसा दिया कि वे अपनी दावेदारी छोड़ दें और हमें खेल करने, माफ कीजिए, कराने का जिम्मा दिया जाए। खैर, कितना अच्छा हुआ कि हमें मेजबानी मिली। अब पूरे विश्व को दिखाने का मौका मिल ही गया है तो पूरे जी-जीन से यही कोशिश करनी है कि कोई चूक न रह जाए। शुरुआत की हमने खेल गांव बनाने से। कितने अहमक होते थे वे लोग जो कहते थे कि मूर्खों के गांव नहीं बसते। गांव का क्या है पैसा लाओ, अभी बसा देते हैं। यमुना के किनारे गांव अच्छा बसेगा, यह बात सबकी समझ में आ गई। फिर क्या था, सुप्रीम कोर्ट को भी बात जम गई। कहा, बसाओ गांव। देखते हैं कौन रोकता है। गांव बसने लगा। अब बांस बल्लियों का जमाना तो है नहीं। बुल्डोजर, कंक्रीट, टाइल्स, लैंडस्केप, एलिवेटर, जकूजी जैसे शब्द तैरने लगे हवा में।

दिक्कत एक बात की थी कि समय कम था। फिर भी हम भारतवासी ठहरे। हमने नदियों का रुख मोड़ दिया है, यह तो एक गांव का मामला है। जिम्मा संभाला था कलमाड़ी एंड कंपनी ने। वे अपने भागीरथ प्रयत्न के लिए ही जाने जाते हैं। सब बड़ी उम्मीदों से उनकी तरफ देख रहे थे। उन्होंने भी अपना कुनबा जुटाया और जुट गए। लंदन से शुरुआत की और खेल गांव तक पहुंच गए। खेलने के लिए स्टेडियम भी दुरुस्त करने थे। कहीं कोई दिक्कत नहीं थी। खेलों के लिए खेलने लगे वह और इस धुन में नियमों का ध्यान नहीं रहा। अब आपातकाल में मर्यादा की बात तो होती नहीं है। होते-होते किसी नामुराद पत्रकार की निगाह पड़ गई उन पर। बस, उसने खोद डाली नई नवेली सड़क जिस पर चल कर खिलाड़ी आने थे। कई कमियां गिना दीं। बड़ा हो हल्ला मचा। क्या अखबार क्या चैनल बजने लगा राग कलमाड़ी। सुर में तो कुछ भी नहीं था लेकिन सब सुन रहे थे।

प्रणब दादा कूदे। अंत में प्रधानमंत्री भी कूद पड़े कि क्या हो रहा है। सीवीसी ने उछल-कूद मचाई। जनता को खराब लगा। कहने लगी, यह कैसे खेल हैं। इसमें तो भ्रष्टाचार हो रहा है। सामान घटिया लगा रहा है, पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है। सत्तर हजार करोड़ में तो नया शहर बस जाता। एक मंत्री जी तो राशन-पानी लेकर खिलाफत पर उतर आए। मांग उठी कि ऐसा नहीं चलेगा। शेरा अपना शुभंकर है तो क्या हुआ, शेर को शाकाहारी होना चाहिए। क्या कहा, शेर को शाकाहारी होना चाहिए। लोगों ने कहा, अखबारों ने कहा, चैनलों ने कहा और तो और नाखून व दांत गंवा चुके शेरों ने भी कह डाला।

तख्तियों पर लिख कर लोग निकल पड़े। हर गली से, हर मुहल्ले से, हर शहर से ऐसा शोर उढने लगा कि शेर को शाकाहारी होना चाहिए। गरम मिजाज के लोगों ने कहा, शेर को शाकाहारी होना पड़ेगा। देखते हैं कैसे नहीं होता। किसी ने कहा, खेल टाल दो। सुप्रीम कोर्ट ने नो एंट्री की तख्ती दिखा दी। शेर को क्या पड़ी थी कि कुछ सुनता। उसने भी सोचा चिल्ला रहे हैं, चिल्ला लेने दो। सर्कस का मालिक ही कुछ करेगा। मालिक ने सोचा, ऐसे तो तमाशा बिगड़ जाएगा। उसने नया रिंग मास्टर रख लिया। उसे मालूम तो था कि यह पुराना शेर है जो अब रिंग मास्टर बन गया है और कभी इसके आगे भी लोग शाकाहारी वाली मांग रख चुके हैं। उसने बुलाया उसे और कहा कि देख, लोग आएंगे, चिल्लाएंगे, शराफत का हवाला देंगे, कसमें देंगे कि तुम रिंग मास्टर हो, शेर को इस तरह से ट्रेनिंग दो कि वह गोश्त खाना छोड़ दे। तुम जानते हो तुम्हें क्या करना है। उसने हामी भरी और कहा कि मेरी ट्रेनिंग का कमाल देखेंगे तो दंग रह जाएंगे। मेरा नाम सीवीसी ऐसे ही नहीं है।

सीवीसी ने कहा, शेरों अभी जितना खाना है, खा लो। खेल हो जाने दो। फिर हम एक खेल खेलेंगे। लोगों को बताएंगे कि हमने एक शपथ पत्र बनाया है जिस पर सभी शेर हस्ताक्षर करेंगे कि वे अब गोश्त नहीं खाएंगे। लिहाजा, अभी जितना खा सकते हो, खा लो। थोड़े समय जुगाली करनी है। जब खेल खत्म होंगे तो लोग वैसे भी मांग छोड़ देंगे क्योंकि उन्हें भी तो अपने भीतर बैठे शेरों को जगाना है। हम भी जानते हैं और वह भी कि शेर शाकाहारी हो ही नहीं सकता। यकीन नहीं आता तो मंत्री, पुलिस, वकील, पत्रकार किसी से भी पूछ कर देख लो।

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