दल और गठबंधन
यह लोकतंत्र की ही महिमा है कि देश में राजनीतिक दलों की भरमार हो गई है और शायद यही इसकी ताकत भी है। हर दल अपनी अपनी ताकत के सहारे यह साबित करने में जुटा है कि उसका दल ही इस देश को आगे ले जा सकता है, लोकतंत्र को मजबूत बना सकता है। उनका सोचना भी सही है। क्यों किसी और पर भरोसा करें। हमारे पास सात (7) राष्ट्रीय दल हैं, सैंतालिस (47) क्षेत्रीय दल हैं। इनके अलावा सात सौ तीस (730) ऐसे दल हैं जो चुनाव आयोग में पंजीकृत तो हैं लेकिन उन्हें राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों के रूप में कोई मान्यता प्राप्त नहीं है। फ़िर पैंतीस (35) ऐसे दल भी हैं जिन्होंने चुनाव आयोग में स्वयं को पंजीकृत नहीं कराया। कुल मिलाकर हमारे पास दल ही दल हैं, आप चुन तो लें। अब संसार के किसी और देश में दलों के मामले में इतने विकल्प नहीं मिलते तो हम क्या कर सकते हैं। यही तो हमारी, हमारे लोकतंत्र और हमारी जनता की जीत है।
और, इतने दलों ने पूरे देश में जनतंत्र को इस तरह संभाल रखा है कि मजाल है कोई हमारे किसी भी तंत्र के लिए कोई खतरा बन सके। लेकिन समय थोड़ा बदल रहा है। बड़ी पार्टियों को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पा रहा है। यह तस्वीर थोड़ी लुभावनी भी है औए डरावनी भी। लुभावनी इसलिए कि भागीदारी का हक़ तो सबका है और डरावनी इसलिए कि मामला बंदरबांट तक जा पहुँचता है। यदि सबका मंतव्य देश को विकसित बनने का है तो इतनी खींचतान क्यों? रास्ते अलग अलग हो सकते हैं लेकिन लक्ष्य एक है तो इतना शोर क्यों? छल-बल का सहारा क्यों? जिस दल ने बरसों तक किसी दल को गरीबों का विरोधी बताया और अचानक कुर्सी को करीब देखते ही सारा विरोध छू हो गया। यही नहीं चुनाव को निकट देख फ़िर पैंतरा बदल लिया। मानों दुश्मन हों। दोस्ती भी अजीब है। एक राज्य में साथ हैं तो दूसरे में अलग। नीतियां राज्यों के हिसाब से जनता के हित में होती हैं। यह गोरखधंधा समझ में नही आता है।
दरअसल, आपसी वैमनस्व इस रंग का है कि साठ साल की गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, अंधेरे में डूबे गाँव दिखायी नहीं पड़ते, औरतों-बच्चों की सिसकियाँ सुनाई नहीं पड़ती, नौजवानों की बेकारी पर ध्यान नहीं जाता। दंगों में खाक होते इंसान नहीं दीखते। आतंक में झुलसते घर नहीं दीखते। रिश्तों की बलि चढ़ते रिश्ते नहीं दीखते। और जब तक इनसे आँखें मूंदे रहेंगे, दलों का होना, गठबंधन का होना महज एक गाली की तरह ही है। इससे बचना है तो सकारात्मक सोच की डोर से बंधना होगा और जो इसके लिए तैयार है, वही लोकतंत्र की जय बोलने का सच्चा हकदार है,
और, इतने दलों ने पूरे देश में जनतंत्र को इस तरह संभाल रखा है कि मजाल है कोई हमारे किसी भी तंत्र के लिए कोई खतरा बन सके। लेकिन समय थोड़ा बदल रहा है। बड़ी पार्टियों को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पा रहा है। यह तस्वीर थोड़ी लुभावनी भी है औए डरावनी भी। लुभावनी इसलिए कि भागीदारी का हक़ तो सबका है और डरावनी इसलिए कि मामला बंदरबांट तक जा पहुँचता है। यदि सबका मंतव्य देश को विकसित बनने का है तो इतनी खींचतान क्यों? रास्ते अलग अलग हो सकते हैं लेकिन लक्ष्य एक है तो इतना शोर क्यों? छल-बल का सहारा क्यों? जिस दल ने बरसों तक किसी दल को गरीबों का विरोधी बताया और अचानक कुर्सी को करीब देखते ही सारा विरोध छू हो गया। यही नहीं चुनाव को निकट देख फ़िर पैंतरा बदल लिया। मानों दुश्मन हों। दोस्ती भी अजीब है। एक राज्य में साथ हैं तो दूसरे में अलग। नीतियां राज्यों के हिसाब से जनता के हित में होती हैं। यह गोरखधंधा समझ में नही आता है।
दरअसल, आपसी वैमनस्व इस रंग का है कि साठ साल की गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली, अंधेरे में डूबे गाँव दिखायी नहीं पड़ते, औरतों-बच्चों की सिसकियाँ सुनाई नहीं पड़ती, नौजवानों की बेकारी पर ध्यान नहीं जाता। दंगों में खाक होते इंसान नहीं दीखते। आतंक में झुलसते घर नहीं दीखते। रिश्तों की बलि चढ़ते रिश्ते नहीं दीखते। और जब तक इनसे आँखें मूंदे रहेंगे, दलों का होना, गठबंधन का होना महज एक गाली की तरह ही है। इससे बचना है तो सकारात्मक सोच की डोर से बंधना होगा और जो इसके लिए तैयार है, वही लोकतंत्र की जय बोलने का सच्चा हकदार है,

