सात जनवरी की सर्द सुबह हमारे मित्र डॉ. तिवारी का फोन आया, भारतवंशियों के मेले में चलना चाहेंगे क्या।
हमने पूछा, मेला जैसा क्या है वहां।
उन्होंने कहा, खुद आकर देख लीजिए।
खैर, हम वहां जाने के लिए निकले ही थे कि बेचैन बक्सरी मिल गए। उन्होंने जब जाना कि हम प्रवासी भारतीय दिवस के आयोजन में विज्ञान भवन जा रहे हैं तो पहले तो उन्हें समझ नहीं आया कि यह कौन सा दिवस है। उन्होंने पूछा, क्या यह स्वतंत्रता दिवस जैसा कुछ है।
हमने उनके भोलेपन पर हिन्दुजा बंधुओं वाली मुस्कान फेंकते हुए कहा, आप चलिए तो सही।
किसी तरह हम वहां पहुंचे तो प्रधानमंत्री अपना स्वागती भाषण देकर जा चुके थे। कुछ प्रवासी चाय की चुस्कियों में अपने बंधुओं से मिलने में मशगूल थे तो कुछ अंदर सभागार में भारत में आधुनिक प्रौद्योगिकी के जनक सैम पित्रोदा की रोचक किंतु अविश्वसनीय बातों से जूझ रहे थे। सैम बता रहे थे कि भारत की अव्यवस्था में भी कितना रोमांच है। उन्होंने बड़ी सफाई और चतुराई से अपनी व्यवस्था की खामियों को नए अनुभवों के ज्ञान से जोड़ दिया। सड़क नहीं है तो क्या हुआ, बिजली के बिना अंधेरे का राज है तो डरना कैसा, कानून व्यवस्था ठीक नहीं है तो घबरा कर चले जाने में खेल का मजा नहीं है वगैरह-वगैरह। बेचैन बक्सरी हमारी तरफ यूं देख रहे थे मानो किसी सर्कस में आ गए हों और करतबों व कलाबाजियों से भौंचक थे। कनाडा में भारतीय मूल की सांसद रूबी ढल्ला की शानदार अंग्रेजी, उड़ीसा के सांसद जय पांडा और केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद द्वारा युवा भारतवंशियों को भारत के प्रति उनके प्रेम और कर्तव्य का स्मरण कराने की अदा से बक्सरीजी मुग्ध भी थे।
बाहर आकर उन्होंने अपनी जिज्ञासा का पिटारा खोला जिसकी हमें पूरी उम्मीद थी। हमने कहा, वयलार रवि का प्रवासी भारतीय मंत्रालय इस सारे आयोजन के केंद्र में होता है जो साल में एक बार उन सारे भारतीयों को बुलावा भेजता है जो भारत के नागरिक हैं लेकिन विदेश या तो पढ़ने या नौकरी के सिलसिले में गए हैं या भारतीय मूल के हैं और दूसरे देशों की नागरिकता हासिल कर ली है।
उन्होंने फिर सवाल उछाला, लेकिन बुलाते क्यों हैं।
हमने समझाने की कोशिश की, आप तो जानते ही हैं कि लड़का जब कमाने लगता है तो उसकी घर में पूछ बढ़ जाती है। सबकी आंखों में उसके लिए आदर होता है। उसके आते ही सब उसके सत्कार में जुट जाते हैं। उसकी निगाह घूमी नहीं कि घर वाले बड़ी तत्परता से पूछने लगते हैं कि कुछ चाहिए क्या। फिर खाने-पीने के बाद सब उसे घेर कर बैठते हैं। घर का सारा हाल-चाल बताया जाता है। कहा जाता है कि वैसे तो सब ठीक है लेकिन अपने छोटे भाई के लिए भी कुछ देखना। तुमसे ही आसरा है। जब से तुम गए हो, बड़ा सूना-सूना लगता है। ज्यादा क्या कहना, तुम तो सब जानते ही हो।
बक्सरीजी उखड़ने लगे। बोले, यह क्या बड़बड़ाने लगे तुम।
हमने और साफ किया। थोड़ा समझने की जहमत तो उठाइए। बेशक घर वालों के रोज रोज मिलने वाले तानों से दुखी होकर बेटा पैसा कमाने निकलता है लेकिन जैसे ही दिखता है कि उसने ठीक ठाक पैसा कमा लिया है तो घर वालों का प्रेम जाग पड़ता है। वही इन भारतवंशियों के साथ हो रहा है। विदेश जाकर इन लोगों ने अपने लिए नाम व पैसा कमाया है तो देश को उनकी याद आने लगी है। सरकार अपने इन लायक बेटों को बुला रही है कि अब जरा अपने घर यानी देश की ओर भी देखो। कुछ पैसा दो यानी निवेश करो। हम खुद तो नहीं कर पाए, तुम जरा आजमाओ। सड़कों का हाल तुम्हारे सामने है, बिजली कम पड़ रही है, पढ़ाई का हाल भी देख ही रहे हो। कुछ करो।
हमने बक्सरीजी को वहीं बने स्टालों में फैले निवेश बाजार में घुमाया। इधर देखिए, राज्यों ने अपनी बैठक सजा रखी है। बुला बुला कर गिना रहे हैं कि हमारे यहां सबकुछ ठीक है। बस पैसा हमारे राज्य में ही लगाओ। यह दीगर बात है कि इसमें बाजी नरेंद्र मोदी मोदी मार लेते हैं। शायद कहने व दिखाने का अंदाज अलग है। जानते हैं, इस बार सरकार ने पूर्वोत्तर के राज्यों में निवेश के लिए जाल बिछाया है। पहले वहां सात बहनें थीं, अब आठ हो गई हैं।
लेकिन ऐसा क्यों कह रहे हो कि सरकार कुछ नहीं कर रही है।
हमने कहा, नहीं कर तो रही है। जनता का पैसा वह नेताओं व अधिकारियों के लिए बचा कर रख रही है। उनके लिए बड़ी दुविधा है कि जनता काम करने के लिए कह रही है, विकास की बात कर रही है, लेकिन पैसा तो कम है। लिहाजा, सरकार को सूझा कि क्यों न विदेश चले गए भारतवंशियों को बुलाया जाए, यहां की अच्छाइयों का बखान किया जाए, उनको भारत के प्रति, जो उनका भी देश है, उनका कर्तव्य याद दिलाया जाए, भावनाओं की लहरों पर उन्हें ऊंचा उठाया जाए। पिछले नौ साल से ऐसा हो रहा है। प्रवासी खुद से पूछते हैं कि क्यों वे यहां पैसा लगाएं। उनके सामने यह बखान किया जा रहा है कि यहां की विकास दर नौ प्रतिशत है, औद्योगिक उत्पादन के मामले में विश्व के शीर्ष दस देशों में भारत का नाम आता है, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज विश्व में सबसे बेहतरीन स्टॉक मार्केट है, यहां आठ करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, विश्व में सबसे ज्यादा डाकघर हैं यहां, पर्यटन यहां की सबसे बड़ी सर्विस इंडस्ट्री है। लेकिन असलियत छिपा ली जाती है। भ्रष्टाचार का कैंसर लाइलाज हो गया है, सड़क पर लोग नाहक एक दूसरे का कत्ल कर देते हैं, पुलिस मदद नहीं करती बल्कि डराती है, बैंक से कर्ज लेने जाओ तो पहले बैंक वालों को कमीशन देना पड़ता है। बीस-बीस सालों तक मुकदमे चलते हैं, १४०० लोग रोज मरते हैं, अदालतों में न्याय बिकता है। क्या-क्या बताएं। आप तो जानते ही हैं। लेकिन इनका कहना है कि बुरा देखना, सुनना, कहना ही क्यों। जो लोग इनके शिकार हैं, वे जानें। हम तो महात्मा गांधी के पक्के शिष्य हैं। आपको यदि हमारी व्यवस्था में कोई खराबी नजर आती है तो इसका मतलब यही है कि आप महात्मा गांधी के शिष्य नहीं हैं और हम उनका अपमान नहीं कर सकते।
बक्सरीजी को अगले दिन भी आने का न्यौता दिया तो वह हाथ जोड़ कर खड़े हो गए।