अपराध और राजनीति-1
राजनीति में अपराधियों की जिस जमात पर हमारा सारा जोर रहता है, उससे इतर हमारे पास कुछ ऐसे शरीफों की भी जमात है जो बस दिखती शरीफ है। इनमें वे सारे लोग आते हैं जो प्रशासन का अंग हैं और उनकी मर्जी के बिना लोगों का काम नहीं हो सकता। बिना रिश्वत दिए कोई काम नहीं करा सकते है आप। रिश्वत लेना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है। हमारे समाज ने यहाँ तक कि सरकार ने भी रिश्वतखोरी को स्वीकार कर लिया है और यही कारण है कि भ्रष्टाचार एक रस्म बन गया है जिसे पूरा न करना पाप की तरह होता है। लेकिन यह अपराध की वह श्रेणी है जो सबसे खतरनाक है। यदि इन अपराधियों की ओर से हमारा ध्यान हट जाता है तो फ़िर अपराध का मान बढ़ने जैसा है यह। और यदि इनका मान बढ़ाना हमें ख़राब नहीं लगता है तो राजनीति के उन अपराधियों को हम क्यों ख़राब मानते हैं।
प्रशासन में बैठा हर व्यक्ति चाहे वह चपरासी है या वरिष्ठ अधिकारी स्वयं को इस नजरिये से नहीं देखता है। उन्हें और देश के हर नागरिक को यही लगता है कि नेता से ख़राब कोई नहीं चाहे उसने कोई अपराध किया है या नहीं। कोई डॉक्टर को, कॉलेज के प्रोफ़ेसर को, इंजिनियर को, दुकान में सामान बेचने वाले व्यापारी को, ऑटो या रिक्शा चलने वाले को, फल या सब्जी बेचने वाले को इतनी पैनी निगाह से नहीं देखता है। आप गौर से इन्हें भी देखें और इनका भी तटस्थ मूल्यांकन करें कि क्या ये अपना काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करते हैं? अगर नहीं करते तो इन्हें भी अपराधियों की कतार में खड़ा करना चाहिए। इनकी तरफ़ से आँख फेर लेने का मतलब यही निकलता है कि हमारे पैमाने अलग अलग हैं और यही वजह है कि हमारे नेता साफ़ छवि वाले नहीं मिल पा रहे हैं।
दरअसल, समुद्र में से चाहे किसी भी कोने से पानी निकालें, पानी खारा ही मिलेगा। हमारे नागरिकों में जितनी ईमानदारी होगी, उतने ही ईमानदार नेता हमें मिलेंगे। हमारी सारी ईमानदारी दोमुंही है। दूसरे से हम पूरी ईमानदारी की उम्मीद करते हैं किंतु बात जब अपनी आती है तो अपनी बेईमानी के पक्ष में कई तर्क दे डालते हैं। क्या इससे भी बड़ा अपराध कोई हो सकता है? राजनीति, अपराध और ईमानदारी को इस आलोक में भी देखने की जहमत हमें उठानी चाहिए ताकि तस्वीर का हर कोना साफ़ साफ़ दिखायी दे।
प्रशासन में बैठा हर व्यक्ति चाहे वह चपरासी है या वरिष्ठ अधिकारी स्वयं को इस नजरिये से नहीं देखता है। उन्हें और देश के हर नागरिक को यही लगता है कि नेता से ख़राब कोई नहीं चाहे उसने कोई अपराध किया है या नहीं। कोई डॉक्टर को, कॉलेज के प्रोफ़ेसर को, इंजिनियर को, दुकान में सामान बेचने वाले व्यापारी को, ऑटो या रिक्शा चलने वाले को, फल या सब्जी बेचने वाले को इतनी पैनी निगाह से नहीं देखता है। आप गौर से इन्हें भी देखें और इनका भी तटस्थ मूल्यांकन करें कि क्या ये अपना काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करते हैं? अगर नहीं करते तो इन्हें भी अपराधियों की कतार में खड़ा करना चाहिए। इनकी तरफ़ से आँख फेर लेने का मतलब यही निकलता है कि हमारे पैमाने अलग अलग हैं और यही वजह है कि हमारे नेता साफ़ छवि वाले नहीं मिल पा रहे हैं।
दरअसल, समुद्र में से चाहे किसी भी कोने से पानी निकालें, पानी खारा ही मिलेगा। हमारे नागरिकों में जितनी ईमानदारी होगी, उतने ही ईमानदार नेता हमें मिलेंगे। हमारी सारी ईमानदारी दोमुंही है। दूसरे से हम पूरी ईमानदारी की उम्मीद करते हैं किंतु बात जब अपनी आती है तो अपनी बेईमानी के पक्ष में कई तर्क दे डालते हैं। क्या इससे भी बड़ा अपराध कोई हो सकता है? राजनीति, अपराध और ईमानदारी को इस आलोक में भी देखने की जहमत हमें उठानी चाहिए ताकि तस्वीर का हर कोना साफ़ साफ़ दिखायी दे।
लेबल: अपराध, ईमानदारी, भ्रष्टाचार

