दूसरा मत

रविवार, जनवरी 02, 2011

वे, जो फरमाते हैं

बच्चे स्कूल जा चुके थे। अखबार की खबरों में उलझा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई। देखा तो बक्सरीजी खड़े थे।

मैंने कुटिल मुस्कान के साथ पूछा, कहां चले गए थे। बहुत दिनों से देश के हालात पर विधवा विलाप नहीं हो पाया।

बेचैन बक्सरी जी कुछ नहीं बोले। चुपचाप प्रसाद (छठ) की पोटली पकड़ाई और धम से तख्त पर बैठ गए। कुछ देर शांत रहने के बाद उनके भीतर का जागरूक नागरिक बोल उठा, जरा यह बताओ कि सुदर्शन ने जो कहा है, वह सही तो नहीं है। क्या वाकई सोनिया ने अपनी सास और पति का राम बोलो करवा दिया।

मैंने कहा, वो ऐसा क्यों करवाने लगी। भला अपने ही घर को कोई उजाड़ता है।

नहीं, तुम समझते नहीं हो। जैसा कि सुदर्शन यह भी कह रहे हैं कि वह अवैध संतान हैं तो उसके भाग से छींका टूटा कि राजीव ब्याह कर ले आए। हो सकता है कि उसके मन में धीरे धीरे यह लालच जागा हो कि एक न एक दिन इस देश पर राज करूंगी। उसके लिए जरूरी था कि औरंगजेब के पद चिह्नों पर चला जाए।

क्या ऊलजुलूल बोले जा रहे हैं। ऐसा कहीं होता है। आपने देखा नहीं कि किस शालीनता और त्याग से उन्होंने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया।

बक्सरीजी तमतमा गए। बोले, अरे भई तुम तो कांग्रेसियों की जुबान बोलने लगे। ये जो लोग हैं, फरमा रहे हैं कि असली बात क्या है तो तुम उनकी तरफ से सफाई क्यों देने लगते हो।

तब तक पत्नीजी बिना कहे नाश्ता ले आई थीं।

मैंने बक्सरीजी को और उकसाया, आप क्या कहना चाहते हैं कि सुदर्शन, गडकरी, मोदी जो कहें वो ठीक और राहुल, सोनिया, दिग्विजय, सिंघवी जो कहें वो गलत। गडकरी कितना कुछ बोलते हैं। कभी कहते हैं कि प्रवासियों के कारण दिल्ली-मुंबई का विकास रुक गया है तो कभी फरमाते हैं कि दिग्विजय मुसलमानों के रिश्तेदार हैं। अब तो कहा जा रहा है कि सुदर्शन के पीछे गडकरी हैं। गडकरी जो कहना चाहते थे, वह उन्होंने सुदर्शन से कहलवा दिया। दूसरी तरफ सोनिया भी फरमाती हैं, राहुल भी बोलते हैं। मोदी को मौत का सौदागर किसने कहा, सोनिया ने। सिमी और आरएसएस को एक जैसा किसने कहा, राहुल ने।

क्या मतलब। तुम किसकी तरफ से बोल रहे हो।

मैं किसी की तरफ से नहीं बोल रहा हूं। बोलने की जरूरत ही नहीं है। बोलने वाले पहले ही इतने सारे हैं कि हमारी कौन सुनेगा। आपके साथ दिक्कत यही है कि आप बातों को दिल से लगा लेते हैं। सुदर्शन ने कहा और आप निकल पड़े देश के दुर्भाग्य पर मर्सिया पढ़ने। हकीकत तो बस इतनी सी है कि ये जितने नेता हैं, समय समय पर ऐसा वैसा फरमाते रहते हैं। वे उस खेल के नियमों से बंधे हैं जिसे राजनीति कहते हैं। राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप की गुंजाइश खत्म हो जाए तो खेल का मजा खराब हो जाता है। मुद्दे तो हवा में तैरते ही रहते हैं। बस समय और माहौल के हिसाब से उन्हें पकड़ लेना है, कुछ कहना है और जनता व मीडिया को स्टापू खेलते देखना है। कभी भ्रष्टाचार है तो कभी महंगाई है, कभी आतंकवाद है तो बाढ़-अकाल-भुखमरी। सोचो ये बयान खत्म हो गए तो मीडिया की खुराक कहां से आएगी। जनता को भी तो झुनझुना चाहिए बजाने के लिए। मेरा नेता अच्छा तो तेरा नेता बुरा। कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी की तरफ से लड़ने को मुद्दे की अफीम कहां से मिलेगी। क्योंकि नशा बने रहना जरूरी है। होश में आ गए तो समझ में आ जाएगा कि पर्दे के पीछे का सच क्या है। दालमंडी में रात में जाओ और दिन में जाओ तो क्या एक जैसा दिखता है, नहीं। दिन के उजाले में चीजें साफ दिखती हैं। इसीलिए बयानों, प्रदर्शनों, संसद में हंगामों से धुंध बनी रहती है।

बक्सरीजी नाश्ता कर चुके थे। हाथ में पानी का गिलास था लेकिन पी नहीं रहे थे। मैंने कहा, पानी तो पी लीजिए।

हां, पी तो रहा हूं। लेकिन जो कह रहे हो, क्या वाकई ऐसा ही है।

मेरे कहने से नहीं, आप खुद समझिए। ऐसा नहीं होता तो राहुल यहां-वहां नहीं डोलते फिरते, ए. राजा बेहयाई से कुर्सी से चिपके नहीं रहते, जयललिता अचानक सोनिया के करीब नहीं आ जातीं, मनमोहन सिंह कुछ भी बोलने से पहले सोनिया की तरफ नहीं देखते, नेता अरबों रुपये नहीं डकार जाते, चह्वाण और कलमाड़ी हिम्मत नहीं करते घोटालों की पोटली बगल में दबाने की, हंसराज भारद्वाज कर्नाटक में भाजपा से कबड्डी-कबड्डी नहीं खेलते, कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी नहीं बनते, साधुओं में अपराधी नहीं छिपे होते, नित्यानंद और इच्छाधारी बाबा देह व्यापार के पंडित निकलते, देश से भुखमरी खत्म हो गई होती, अदालतों में न्याय नहीं बिकता। लिहाजा, अफीम और झुनझुना जरूरी है। खाइए औऱ बजाइए।

बक्सरीजी की बेचैनी बढ़ने लगी। बोलो, अच्छा चलता हूं, फिर आऊंगा।

मैंने आग्रह किया, जरूर आइएगा, देश के हालात पर चर्चा जारी रहेगी।

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आ रहे हैं भगवान ओबामा

हर नागरिक अभिभूत है। भावनाओं का सागर हिलोरें ले रहा है। कोई सामान्य घटना तो है नहीं। सदियों बाद ऐसा होता है। सब जानते थे कि सिर्फ दस अवतारों से इस धरती का काम नहीं चलने वाला है। उनको आना ही होगा। भक्तों की पीड़ा सुनने वे नहीं आएंगे तो कौन आएगा। हम न जाने कब से अंधकार में पड़े हैं। रोशनी दिखाने वाला आएगा। अब ज्यादा दिन नहीं हैं। वे बस आना ही चाहते हैं।

सबको खबर कर दी गई है। क्या राजा, क्या प्रजा, सभी पलक पांवड़े बिछाए हुए हैं। कहीं कोई कमी न रह जाए स्वागत में। तय कर दिया गया है कि मिनिस्टर-इन-वेटिंग कौन होगा। क्या पद है। वह बिछे जा रहे हैं कि हर किसी के जीवन में ऐसा अवसर नहीं आता। अब और जीवन से क्या चाहिए। इधर, तैयारी पूरी है। वे कहां विराजमान होंगे, किन-किन रास्तों से होकर कहां-कहां जाएंगे, उनकी मर्जी से तय किया जा रहा है। रास्ते बुहारे जा रहे हैं। मैनहोल तक खंगाले जा रहे हैं। अब क्या है कि भगवान तो हैं वे लेकिन यह 21वीं सदी है। इसलिए व्यवस्था करनी पड़ती है। सब जय-जयकार कर रहे हैं। आने तक का इंतजार कौन करे। मैडम राव पहले ही जाकर दूत का फर्ज निभा आई हैं।

भगवान ओबामा आ रहे हैं।

हमारे राजा और उनके मंत्रीगण प्रसन्न हैं। उन्हें लग रहा है कि भक्ति का मान रखा प्रभु ने। वे अपने विशेष विमान से आएंगे। सीधे मुंबई जाएंगे। हमारी दुखती रग को सहलाएंगे। हमें पूरा यकीन है कि वे कहेंगे कि आतंक से इस लड़ाई में वे हमारे साथ हैं। हों भी क्यों न, उनका घाव भी अभी हरा ही है। कलिकाल के भगवान जो ठहरे। दिक्कत यह पैदा हो गई है कि देवलोक अमेरिका में बहुत सारे देवता उनके खिलाफ हो गए हैं। क्या आप जानते नहीं है कि आज के देवलोक में भी लोकतंत्र का बोलबाला है। लिहाजा, चुनाव में हार की गर्म हवा उन्हें सता रही है। वह कुछ ठंडक पाने ही तो यहां आ रहे हैं। आएंगे तो उनकी रेटिंग बढ़ जाएंगी। याद कीजिए, क्लिंटन की भी ऐसे ही बढ़ी थी। अप्सरा मोनिका के साथ रंगरेलियां मनाने के बाद भी उनका भाव चढ़ गया था।

हमारे राजा व उनके दरबारी सोचने में लगे हैं कि भगवान आएंगे तो इतना तो जरूर कहेंगे कि वत्स, मांगो क्या वर मांगते हो। हम तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हैं। तुमने हमारे साथ परमाणु करार किया है। तुम्हारी तपस्या का फल तो जरूर मिलेगा। लेकिन ऐसा वर मांगना जिस पर मैं तथास्तु कह सकूं। वे जरूर कहेंगे, प्रौद्योगिकी निर्यात की बात मत मांगना। सबकुछ कैसे दे सकता हूं। मुझे भी तो जवाब देना है। यह दीगर बात है कि तुम मुझे भगवान मान रहे हो। हां, एक बात और संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता का वर भी मत मांगना। अब तुम जानते ही हो कि मैं कितना भी प्रसन्न हूं लेकिन अपना सिंहासन थोड़े ही दे दूंगा। तुम्हें बगल में बैठाने से पहले मुझे कई बार सोचना पड़ेगा। लिहाजा ये जटिल व पेचीदा वरदान मैं नहीं दे पाऊंगा। कहना ही मत। इस मामले में तुम्हारी इतनी बात मान सकता हूं कि तुम्हारे सामने कश्मीर की बात मैं नहीं करूंगा। पाकिस्तान को मैं समझा रहा हूं। थोड़ा शरारती है। मान जाएगा। आज नहीं तो कल मान जाएगा। अभी मुझे उससे काम है इसलिए ज्यादा जोर नहीं डाल सकता। तालिबान, अलकायदा से लड़ाई में उसकी जरूरत है। मैं भगवान हूं तो क्या हुआ, हूं तो आज का। सबके संहार की क्षमता मुझमें नहीं है। यह दीगर बात है कि दुनिया में कई देशों में मैंने नाहक ही अपने दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर दिया है। और सुनो, अपने देवलोक में मैंने कितने नर-नारियों को (भारतीयों) को अपने दरबार (कांग्रेस) में जगह दी है। वे चाहे मेरी पार्टी में हों या विरोधियों की। निक्की को गवनर्र बन जाने दिया। यह क्या कम है।

खैर, हम तो उनके स्वागत की तैयारियों में जुटे हैं। होटल का चप्पा-चप्पा छान मारा है हमने। गुलाब की पंखुड़ी भी कोई उनकी तरफ नहीं उछाल पाएगा। मुंबई में आकाशमार्ग से उतरेंगे। वहां वे बच्चों के साथ दीवाली मनाएंगे। कुछ खास जगहों पर जाएंगे। रास्ते को हम अपनी पलकों से बुहार रहे हैं। सड़कों में हमने अपनी आंखें धंसा दी हैं। खाने के लिए क्या-क्या नहीं जुटाया है। उन्होंने एक बार हल्के-से कह दिया था कि प्लैटर पसंद है। अब हिलेरी के प्लैटर से कम हुआ तो हमारी खैर नहीं। हमारे शेफ जुटे हैं। अभी से प्याज छीलने में लग गए हैं।

मुंबई के बाद भगवान दिल्ली आएंगे। राजघाट पर लंगोटी वाले बाबा की समाधि पर अपना शीश झुकाएंगे। बस यही बात समझ से बाहर है। सब लोग उनकी समाधि पर क्या करने जाते हैं। रस्म बड़ी चीज है निभाते रहिए, इस फॉर्मूले का चक्कर है तो ठीक है क्योंकि देवलोक के लोग गांधी की अहिंसा को तो अपने रथ के पिछवाड़े डालकर घूमते हैं। वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक, कंबोडिया से लेकर इराक तक अहिंसा के झंडे का झ भी नहीं बचा है। हां, हर लड़ाई को वे देवासुर संग्राम का नाम जरूर देते हैं वर्ना अमृत के असुरों के हाथों पड़ जाने का खतरा है।

अंत में कुछ अर्ज करना चाहूंगा। जॉर्ज पंचम की शान में तो गीत रचा गया था और उसे हम आज भी अपने माथे से लगाए बैठे हैं। अब देखना यह है कि ओबामा के लिए क्या-क्या समर्पित किया जाएगा। तो आइए, सब मिल कर कहें- भगवान ओबामा की जय। ना...ना... इंकार मत कीजिए। देशद्रोह का मुकदमा चल सकता है।

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ये जो देश है मेरा

बेचैन बक्सरी सुबह-सुबह ही आ धमके थे। बेहद गुस्से में थे। हम अखबार के पन्ने पलट रहे थे। आते ही सवाल दागा, इ गिलनिया और अरुंधतिया कौन है जी? तुम जानते हो इनको?

हमने हंसते हुए कहा, हां, देखा तो है। बूढ़े आदमी हैं। कब्र में पांव लटके हैं। थोड़ा भटके हुए हैं, इसलिए कब्र का पता पूछ रहे हैं। दाढ़ी मूंछ सफेद हैं। अरुंधती एक महिला हैं। जवान हैं। बाल भी काले हैं।

बस फिर क्या था। उखड़ गए हत्थे से। बोले, तुम्हें मजाक सूझ रहा है। सही-सही बताओ क्या हैं ये लोग।

हमने कहा, पहले त्यौरियां तो उतारिए। इसके बाद हमने बच्चों की मां से चिरौरी की कि देखो तो बक्सरी जी आए हैं। जरा गर्म चाय मिल जाए तो इनका मन कुछ ठंडा हो। उन्होंने बड़े ठंडे भाव से चाय का पानी गर्म होने के लिए रख दिया।

उनका मन कुछ शांत-सा दिखने लगा तो मैंने बात में लकड़ी डाल आग उकेरी। पूछा, आपको का लेना है गिलनिया और अरुंधतिया से।

अंगोछा सिर पर बांध शास्त्रार्थ की मुद्रा में आते हुए बोले, लेना क्यों नहीं है। और हमको ही क्यों, हिन्दुस्तान के हर नागरिक को लेना है। कैसी बातें करता है वह। दिल्ली में आकर कश्मीर को अलग करने की बात करता है। कहता है कि लद्दाख वाले भी चाहते हैं कि आजादी मिले। और, वो जो औरतिया है, उसकी हिम्मत तो देखो। कहती है कि कश्मीर हमारा न था, न है। तुम्हें उनका ऐसा बोलना कुछ भी नहीं लगता।

ठीक ही तो है। कश्मीर में रहता है। खुद को अलगाववादी कहता है। वैसे है वह हुर्रीयत का अध्यक्ष लेकिन बात अलगाव की करता है। इसी पर उसकी दुकान चलती है। नौजवानों को बरगलाता है। पत्थर फिंकवाता है। कहता है, जाओ फौजियों को इतना तंग कर दो कि वे गोली चला दें। फिर जैसे ही कोई मरता है, कहता है, देखो ये लोग अत्याचार कर रहे हैं। उसका तो काम ही कुछ ऐसा है। उसके लिए क्यों माथा खपा रहे हैं।

और यह महिला क्या चाहती है?

वह क्या चाहेगी। वह तो बायीं तरफ झुकी हुई है। दावा है कि वह लेखिका है। बहुत बड़ा पुरस्कार भी मिला है। उसे तो ऐसे कामों में मजा आता है। आप नहीं जानते कि सरकार को अंग्रेजी में और भोंपुओं के पीछे खड़े होकर जुतियाने में कितना मजा आता है। उसको मालूम है। पहले भी तो उसने कहा था कि नक्सलियों ने बंदूक उठाकर सही किया है। अब कश्मीर पर बोल रही है। हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, यह भी आपको बताना पड़ेगा।

बक्सरी भौंचक से हमारी तरफ देख रहे थे। उन्हें लगा कि हमारे लिए इन बातों का कोई महत्व नहीं है। बोले, बड़े अहमक हो तुम। इतनी आसानी से कैसे कह रहे हो। गुस्सा नहीं आता तुम्हें।

हमने उनकी झुर्रियों में झांकते हुए कहा, जानते नहीं क्या, क्रोध से विवेक मर जाता है। हिंसा से शुरु हुई हर बात शांति पर खत्म होती है। इसीलिए तो सरकार ने शांत भाव से बातचीत करने वालों को कश्मीर भेजा है।

उछलकर बोले,वही जिसमें तुम्हारी बरादरी का भी एक आदमी है। बहुत बोलता है। तुम लोगों को तो बोलने की बीमारी है। मौका मिला नहीं कि शुरू हो गए। वह तो और नालायक है। कहता है कि पाकिस्तान को भी बुला लो बात करने के लिए। बड़ा ज्ञानी है। पिछले साठ सालों में यह बात किसी की समझ में नहीं आई। अब यह कह रहा है तो मान लो।

हमने भी टाटा का शुद्ध नमक छिड़का। ठीक ही तो है। सरकार को यह बात कहां समझ में आ रही थी। दोनों देशों का बड़ा पैसा खर्च हो रहा है लड़ाई झगड़े में। लिहाजा, उन्हें भी बुला लो। आतंक-आतंक चिल्लाते रहते हैं लेकिन कुछ बदला। रातोंरात सड़क बनवा कर एक प्रधानमंत्री उनके पास गए। उनके राष्ट्रपति हमारे पास आए। क्या हुआ। वही ठाक के तीन पात। हम कहते हैं आतंक, वे कहते हैं कश्मीर। दोनों अपना-अपना राग छेड़े हुए हैं। इस बीच घाटी में पत्थर चलते हैं। सीमा पर बंदूकें चलती हैं। कुछ लोग मरते हैं और दोनों अपनी-अपनी अदा से हुंकार भरते हैं। यही किस्सा तो चल रहा है। और पाकिस्तान को बुलाने के नाम पर आप क्यों उखड़ रहे हैं। पाकिस्तान पर ही क्यों आग बबूला होते हैं। चीन का कुछ कर पाएंगे क्या। 62 को भूल गए। आज वह अक्साई चीन को अपना कहता है। अरुणाचल प्रदेश को अपना कहता है। उसी कश्मीर के लोगों को नत्थी वीजा देता है। जनरल साहब को ठेंगा दिखा देता है। उसका क्या उखाड़ लिया।

अब बक्सरी जी मेरी तरफ शक की निगाह से देखने लगे कि यह भी उनकी तरह ही बोल रहा है। बड़बड़ाने लगे, सब देशद्रोही हैं। इनको फांसी पर लटका देना चाहिए।

मैंने बात आगे बढ़ाई।

अभी कुछ ही समय पहले की तो बात है। कश्मीर के नौजवान मुख्यमंत्री ने बड़े धड़ल्ले से कहा था कि कश्मीर का तो भारत में विलय हुआ ही नहीं है। केंद्र सरकार व कांग्रेस के कई नेताओं ने कितनी आसानी से उसे स्वीकार करते हुए माना था कि उन्होंने गलत कुछ नहीं कहा है। उनके कहने का लोगों ने सही अर्थ नहीं लगाया। कितनों को फांसी पर चढ़ाइएगा। फिलहाल, गिलानी और अरुंधती पर देशद्रोह का मुकदमा चल सकता है, ऐसी खबरें अखबारों में हैं। परेशान मत होइए।

गरम-ठंडी बातचीत के बीच चाय आ गई थी। हमने कहा कि चाय पीजिए। आप क्यों लाल-पीला हो रहे हैं। सरकार कुछ करेगी। सरकार तो गांधी जी से प्रेरित और प्रभावित है। इसीलिए दिल्ली में आकर, ऐसे बयान देकर, तमाचा मारकर लोग चले गए हैं। अब सरकार ने दूसरा गाल आगे कर दिया है। गिलानी ने मारा, अरुंधती ने मारा, उमर अब्दुल्ला ने मारा, अब पत्रकार पडगांवकर तमाचा मार रहे हैं। सरकार प्रफुल्लित हो रही है कि अब तो समझ लीजिए कि गांधीजी का सच्चा अनुयायी कौन है।

बेचैन बक्सरीजी अपनी बेचैन आत्मा के साथ उठ खड़े हुए और जब तक हम अगली चाय पर आने के लिए कहें, वह सब पर लानत भेजते हुए गली से मुड़ चुके थे।

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प्रेम न बाड़ी ऊपजै...

कबीर दास जी ने प्रेम पर कुछ ऐसा लिख दिया कि आज उसका सही अर्थ समझ में नहीं आ रहा है। कहा था- प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय, राजा परजा जेहि रुचे सीस देई ले जाय। वे भी आज होते तो सोचते मैंने क्या कह दिया था। सारा कहा, किया माटी हो गया। प्रेम तो उपज रहा है। शायद आप सवाल करें कि कहां? लगता है आप किसी पार्क में नहीं जाते। न सेहत का खयाल है और न ही प्रेम की बढ़ती बेल का। देखिए तो सही। बुद्ध जयंती पार्क पहुंचिए, लोदी गार्डन में भी जमीन उपजाऊ है। किसी मॉल में ही चले जाइए। किसी मल्टीप्लेक्स में घूम आइए। प्रेम के हर घड़ी, हर गली उपजने का साक्षात्कार हो जाएगा। रही बात हाट में बिकने की तो आपसे बेहतर कौन जानता है कि पूंजीवाद के जमाने में क्या-क्या नहीं बिकता है। अब तो नव उदार पूंजीवाद का जमाना है। बाजार का बोलबाला है। हर गली में हाट है, हर सड़क पर ठाट है और किसी से बात करके देखो तो पता चलेगा कि हर किसी के ठाट-बाट हैं। हाल ही में योजना आयोग के अहलूवालिया साहब ने भी कहा था। खैर, बात कबीर की हो रही थी। उनका कहना था कि कहीं कोई भेद नहीं है। बस सीस ही तो देना है। इधर आपने सिर कटाया, उधर प्रेम की बारिश हुई।

हम चाहेंगे कि कबीर जी अपने कहे में कुछ संशोधन कर लें। एक तो यह कि प्रेम अब बाड़ी-हाट में ही उपजता-बिकता है। दूसरे, सीस देने की बात न करें। कभी रही होगी सबकुछ निछावर करने की बात, देने की बात। अलौकिक हो या शारीरिक, एक से दूसरे गात तक की दिव्य यात्रा का नाम प्रेम रहा होगा। अब वह विशुद्ध बाजार है, अधिकार है, गणित है, स्वतंत्रता की नई परिभाषा है। प्रेमियों के बीच पंचायत भी है। खाप है, मौत की थाप है। इसमें हर किसी को बताने की कानूनी फरमाइश है, गुजारा भत्ता की जोर आजमाइश है। आज यह सहचरी संस्कृति, सहजीवन, लिव-इन रिलेशनशिप के झीने वसन में लिपटी अदालत की पैमाइश भी है।

कुछ शर्तें हैं जिन्हें मानने पर ही आपको खास किस्म का दर्जा मिल पाएगा। आप अदालत में अपने प्रेम की कानूनी हाथों से तार-तार होती पवित्रता को मुस्कराते हुए निहार पाएंगे। गुनाह प्रेम करना नहीं, गुनाह अदालत में जाकर भत्ता मांगना या इनकार करना नहीं है। गुनाह है सबको न बताना कि आप फलां से प्रेम करते हैं। अब अदालत में जाएंगे तो ऐसा ही होगा। परिभाषाएं तय की जाएंगी। मानक तय किए जाएंगे। कसौटियां तय की जाएंगी। उन पर आप खरे उतरे तो प्रेमी नहीं तो अपराधी।

लेकिन क्या वाकई यह किसी के सही गलत होने का सवाल है। प्रेम के आधुनिक आयाम चौंका रहे हैं। शब्दों में लिपटा अपमान पवित्र दायरे में कालिख पोत रहा है। अदालत उसे तो रखैल कह रही है, लेकिन दूसरे को कोई नाम नहीं दे रही है। एक महिला वकील आपत्ति जता रही हैं। संभव है कोई और भी जताए। जरा व्याख्या पर गौर करें- सप्ताहांत या एक रात साथ रहने से कोई दूसरी औरत नहीं बन जाती। संबंधों के आधुनिक शामियाने में कौन किसे किस निगाह से देख रहा है, पता नहीं। दोष की अंगुली किसी की तरफ नहीं है और न ही होनी चाहिए। इतना जरूर इशारा है कि संबंधों की व्याख्या तो आधुनिक पैमानों से हो रही है लेकिन नजरिया अभी भी पुराना है। दोनों में जब तक सामंजस्य नहीं होगा, वादों-फरियादों का सिलसिला चलता रहेगा।

इसमें सबसे अधिक नुकसान प्रेम का ही हुआ है क्योंकि अभी तक प्रेम बंधन है, कलंक है, जागीर है, प्राचीर है। इसे खुले आकाश की तलाश है जहां पंखों को फैला निराकार, निःशब्द, असीम को ओर उड़ा जा सके। कबीर दास को शतशत प्रणाम।

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