क्या जनता चाहती है जागना
आम चुनाव होने वाले हैं। चुनावी शोर बढ़ने लगा है। हर कोई जनता को जगाने की वकालत कर रहा है। मानो जनता सो रही है और चुनाव के नगाड़ों का शोर उन्हें जगा नहीं पा रहा है। कोई लीड इंडिया कह रहा है तो कोई जागो रे चिल्ला रहा है, कोई जन जागरण अभियान चला रहा है तो कोई जनता को यह बता रहा है कि लोकतंत्र में जनता सबसे ताकतवर होती है। लेकिन क्या यह बात जनता जानती है कि उसकी ताकत कितनी है? जानती भी है तो भुलाये बैठी है क्योंकि भुलाने का अपना सुख है। वह जानती है कि उसकी हालत उस स्त्री की तरह है जिसे लंगडे और अंधे में से किसी एक को अपना पति चुनने के लिए कहा जा रहा है। ऐसे में उनकी सूरत देख कर सुंदर पति चुनने का विकल्प कितना उसके सशक्तीकरण का परिचायक है, कहने की जरूरत नहीं है।
वैसे भी जनता को पाँच साल में कभी यह याद नहीं दिलाया जाता है कि वह ताक़तवर है। चुनाव आए नहीं कि वे सभी जनता के सामने नतमस्तक हो जाते हैं जो वोट मांगने के लिए जनता के बीच जाते हैं। जनता भी फूल कर कुप्पा हो जाती है कि चलो पाँच साल में एक बार ही सही, कोई उसके सामने झुकता तो है। यही तो समय है जनता के जनार्दन होने का। कुछ उनके भुलाने से और कुछ अपने फ़साने से पाँच साल तक बेफिक्री का आलम रहता है। क्योंकि इस बीच कुछ किया भी तो नहीं जा सकता है। अगर प्रतिनिधि अच्छा काम नहीं कर रहा है तो पाँच साल इंतजार करना पड़ेगा यह याद करने के लिए कि लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि होता है। प्रतिनिधि फ़िर आकर झुकेगा और जनता अपने जनार्दन होने के नशे में डूब जायेगी।
दरअसल जनता अगर सोई हो तो जगाने का कोई अर्थ बनता है। जनता सोने का बहाना किए सोई हो तो जगाना मुश्किल है क्योंकि सचमुच सोने वाला कुम्भकर्ण थोड़े अधिक प्रयासों के बाद ही सही, जाग तो जाता था। अब लोकतंत्र में बड़ी समस्या यह है कि जो सोने वाला है वही जगाने वाला। बाकि जितने लोग जगाने का महान कार्य करने में जुटे हैं, वे दरअसल अपना प्रचार करने में लगे हैं। यदि जनता सोई रही तो उनके प्रचार का क्या होगा, उनके सामान का क्या होगा। अब जनता किसके जगाने से और किस काम के लिए जागेगी यह जनता को ही तय करना है।
वैसे भी जनता को पाँच साल में कभी यह याद नहीं दिलाया जाता है कि वह ताक़तवर है। चुनाव आए नहीं कि वे सभी जनता के सामने नतमस्तक हो जाते हैं जो वोट मांगने के लिए जनता के बीच जाते हैं। जनता भी फूल कर कुप्पा हो जाती है कि चलो पाँच साल में एक बार ही सही, कोई उसके सामने झुकता तो है। यही तो समय है जनता के जनार्दन होने का। कुछ उनके भुलाने से और कुछ अपने फ़साने से पाँच साल तक बेफिक्री का आलम रहता है। क्योंकि इस बीच कुछ किया भी तो नहीं जा सकता है। अगर प्रतिनिधि अच्छा काम नहीं कर रहा है तो पाँच साल इंतजार करना पड़ेगा यह याद करने के लिए कि लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि होता है। प्रतिनिधि फ़िर आकर झुकेगा और जनता अपने जनार्दन होने के नशे में डूब जायेगी।
दरअसल जनता अगर सोई हो तो जगाने का कोई अर्थ बनता है। जनता सोने का बहाना किए सोई हो तो जगाना मुश्किल है क्योंकि सचमुच सोने वाला कुम्भकर्ण थोड़े अधिक प्रयासों के बाद ही सही, जाग तो जाता था। अब लोकतंत्र में बड़ी समस्या यह है कि जो सोने वाला है वही जगाने वाला। बाकि जितने लोग जगाने का महान कार्य करने में जुटे हैं, वे दरअसल अपना प्रचार करने में लगे हैं। यदि जनता सोई रही तो उनके प्रचार का क्या होगा, उनके सामान का क्या होगा। अब जनता किसके जगाने से और किस काम के लिए जागेगी यह जनता को ही तय करना है।

