माया की माला की माया
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने स्वयं को दलितों व पिछड़ों का मसीहा बनाने या दिखाने के लिए जितने प्रयास किए, वे ही उन्हें विवादों में डालते गए। किन्तु मायावती ने इस बात की तनिक भी परवाह नहीं की कि कौन क्या कह रहा है। हर विरोध इस तर्क की बलि चढ़ता गया कि वे दलित की बेटी हैं और लोगों को दलित का आगे बढ़ना गंवारा नहीं हो रहा है। बाकियों द्वारा गलत किया जाना उनके बचाव की ढाल बनता रहा। लेकिन सदियों से सताए गरीबों व दलितों को आगे लाने के लिए क्या वह सब कुछ किया जाना जरूरी था या है जिनको करके वे प्रतिशोध की झलक दे जाती हैं। इतिहास में दर्ज होना एक बात है और दलितो का जीवन सचमुच बदलना दूसरी बात है। बात मूर्तियां लगवाने से लेकर करोड़ों रुपये की माला तक आ पहुंची है।
राजनीति के रणक्षेत्र में स्वयं को ताकतवर दिखाने के लिए कमोबेश हर पार्टी के नेता विशाल रैलियों के आयोजन से लेकर सोने चांदी से तुलवाने तक का उपक्रम करते आए हैं और इसी तर्क के सहारे मायावती भी चल रही हैं। पर, एक की गलती दूसरे की गलती को न्यायसंगत ठहराने के लिए उद्धृत की जा सकती है क्या? क्या वाकई करोड़ों के नोटों की माला पहनने से मायावती की ताकत का अंदाज लगाया जाएगा? निष्कर्ष तो यही निकलता दिखता है कि जितने ज्यादा मूल्य की माला होगी, नेता उतना ही लोकप्रिय व सम्मानित होगा। उन्होंने दिल्ली के नजदीक इतना विशाल पार्क बनवा डाला और उसमें इतनी मूर्तियां लगवा दीं कि अमरत्व के लिए अमृत की जरूरत ही नहीं रही। इन सारे उपक्रमों पर जनता का इतना सारा पैसा खर्च हुआ है कि हजारों करोड़ स्वाहा हो गए। इसमें तकलीफदेह बात तो सिर्फ यही है कि यह सारा खर्च उस नेता ने किया है जो इस बात का दावा करते नहीं थकता कि वह उन गरीबों, दलितों व पिछड़ों का नेता है जिनको दो जून खाने के लाले पड़े हैं।
बाबा साहब अम्बेडकर ने ऐसा कुछ नहीं किया और फिर भी वे इतिहास पुरुष हैं। उन्होंने भी तो उन्हीं गरीबों व दलितों की वकालत की जिनको समाज में कोई दर्जा नहीं था। वे इतिहास पुरुष बने तो अपने विचारों की विराटता से न कि अपनी मूर्तियों की ऊंचाई से, जिन्हें बाद में लगाया गया। बलिहारी तो यही है कि मायावती के सारे काम उन्हीं बाबा साहब के नाम पर किए जा रहे हैं। मायावती इस बात से क्यों बेफिक्र हैं कि उनका आकलन उनके पिछड़े व दलित नहीं कर रहे हैं। दलित भी सब देख रहे हैं कि उनका मसीहा किसके उद्धार का ढोल पीट रहा है। उनकी शिक्षा की बेहतरी के लिए क्या हो रहा है, उनके लिए रोजगार के अवसर बढें, इसके लिए क्या हो रहा है, उनके स्वास्थ्य के लिए कैसी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, उन पर हो रहे अत्याचारों के लिए क्या कानून बन रहे हैं, ये सबकुछ दलित देख रहे हैं और इन्हीं के आधार पर वे मसीहा का आकलन करेंगे।
दरअसल, मायावती जरा जल्दी में हैं। उन्हें इस बात की जल्दी है कि लोग जल्दी स्वीकार कर लें और समकालीन इतिहास में उनका नाम इस बात के लिए दर्ज कर दें कि वे ही इनकी मसीहा हैं और कोई नहीं है। लेकिन वे भूल रही हैं कि मसीहा नोटों की माला नहीं पहनता, अपनी मूर्तियां नहीं बनवाता और दूसरों ने गलत किया है, इसलिए गलत नहीं करता। लोकतंत्र में और वह भी विकासशील देश में ऐसा नहीं होता कि जनता का पैसा जनता पर न खर्च करके नेता अपनी विराट छवि बनाने पर खर्च कर दे। यह विडम्बना ही तो है कि जिस माया को त्याग ईश्वर को पाया जा सकता है, उसी के मंदिर को सोने चांदी से लादा जा रहा है। मायावती किसका त्याग करेंगी, यह तो उन्हें ही तय करना है।

