महिला आरक्षण और राजनीति का खेल
केंद्र सरकार ने महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में ३३ प्रतिशत आरक्षण देने के लिए एक कदम बढ़ा लिया है। राज्य सभा में इस विधेयक को पारित कराने में बेशक काफी हंगामा हुआ। विभिन्न दलों के सात सांसदों का निलंबन भी देखा गया। मजेदार पहलू यह है कि यादव बंधुओं के समवेत विरोध के बावजूद न तो कांग्रेस उनसे किनारा करना चाहती है और न ही वे समर्थन वापसी का खेल खेलना चाहते हैं। लेकिन विरोध और बहस जारी है। सरकार इस विधेयक के मौजूदा स्वरूप में कोई बदलाव नहीं लाना चाहती है और मायावती समेत कई नेता इसमें अजजा, अजा और अपिजा के लिए आरक्षण चाहते हैं।
आऱक्षण देने के बाद ऐसा माना जा रहा है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व सदनों में बढ़ेगा और वे अपने अधिकारों के लिए ज्यादा मुखर हो पाएंगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा होगा? यह सवाल लोगों व नेताओं के मन में घूम रहा है। कुछ तो इस बात से चिंतित हैं कि उनकी सीट यदि आरक्षित सीट हो गई तो वे कैसे अपना चुनाव क्षेत्र तय करेंगे और कुछ इस बात से परेशान हैं कि इतने योग्य महिला उम्मीदवार कहां से आएंगे? उनकी जीत कैसे सुनिश्चित होगी? पार्टियों के लिए यह मुश्किल तो आएगी कि किस उम्मीदवार को कहां से खड़ा करें कि सीट भी बची रहे और अन्य नेताओं का समर्थन भी मिलता रहे।
उधर महिला सांसद और अन्य महिलाएं इसे महिलाओं की जीत बता रही हैं कि १४ साल से चल रही लड़ाई अब जाकर जीती है उन्होंने। इसमें कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने पुरुष सांसदों का विशेष आभार प्रकट किया है कि उन्होंने सचमुच सहयोग किया। हालांकि इसमें यह तो शामिल है ही कि पुरुषों की तानाशाही को उन्होंने पटखनी दे दी है। बहरहाल, पूरी तरह नियम बनने में अभी देर है क्योंकि लोक सभा से लेकर १५ राज्यों की विधानसभाओं का भी अनुमोदन चाहिए। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह सामने आ रहा है कि क्या वाकई इस विधेयक से पास होते ही महिलाओं का स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आ जाएगा। क्या वाकई सारी महिलाएं उनसे जुड़े मुद्दों पर एकजुट हो जाएंगी। और, क्या वाकई यह सिर्फ महिलाओं या पुरुषों के प्रतिनिधित्व का मामला है?
प्रतिनिधित्व का मसला तो पार्टियां अपने संगठन में और विधायिकाओं के चुनाव में महिला उम्मीदवारों को जगह देकर हल कर सकती थीं किन्तु ऐसा हो नहीं पाया। क्या योग्य उम्मीदवार नहीं थे? यदि नहीं तो अब कहां से आएंगे? यदि थे तो महिलाओं के पक्षपात के आरोप सही हैं। फिर महिलाओं से जुड़े मुद्दों को पुरुष सांसदों द्वारा ठीक ठीक न समझने की कहानी है तो उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठने चाहिए। ये सवाल नेहरू से लेकर आज तक के नेताओं पर खड़े होने चाहिए। इसे व्यक्तिगत न माना जाए क्योंकि इसे पेश ही पुरुष बनाम महिला के रूप में किया गया है। यह भी देखा जाना चाहिए कि जितनी महिलाएं संसद या विधान सभाओं में हैं, उनके क्षेत्र में क्या महिलाओं के सारे मामले हल कर लिए गए हैं?
दरअसल, यह सारा मामला सत्ता और उससे जुड़ी ताकत का है। प्रगतिशील सोच के बैनर तले यह तो होना ही चाहिए कि महिलाएं क्यों सत्ता सुख से वंचित रहें। उन्हें यह भी लगता है कि उनके ३३ प्रतिशत होते ही उनके सारे अधिकार उन्हें स्वतः मिल जाएंगे। खैर, न तो उनकी बुद्धिमत्ता पर कोई सवाल है और न ही उनकी कार्यकुशलता पर। राजनीति के चक्रव्यूह को तोड़कर भ्रष्टाचार के महल में कौन कितना सम्मान पाएगा, यह न तो पुरुष होने से जुड़ा है और न ही महिला होने से। बेहतर शिक्षा की बुनियाद पर सहज सामाजीकरण की पहल जब तक नहीं होगी, एक दूसरे पर उंगली उठाने का प्रहसन चलता रहेगा, चाहे राजनीति का अखाड़ा हो या घर का आंगन। नियमों व कानूनों ने महिलाओं का कितना भला किया है, वह दहेज, घरेलू हिंसा व अन्य मामलों पर बने कानूनों की ईमानदारी से पड़ताल कर जाना जा सकता है।

